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Showing posts from July, 2015

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य

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चन्द्रगुप्त द्वितीय  अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (शासन: 380-412 ईसवी) गुप्त राजवंश का राजा था। समुद्रगुप्त का पुत्र ‘चन्द्रगुप्त द्वितीय’ समस्त गुप्त राजाओं में सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से सम्पन्न था। शकों पर विजय प्राप्त करके उसने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की।  उज्जैन के विक्रमादित्य के समय ही विक्रम संवत चलाया गया था। इतिहासकारों के अनुसार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा ईरान, इराक और अरब में भी था। विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक ‘सायर-उल-ओकुल’ में किया है। पुराणों और अन्य इतिहास ग्रंथों के अनुसार यह पता चलता है कि अरब और मिस्र भी विक्रमादित्य के अधीन थे। तुर्की के इस्ताम्बुल शहर की प्रसिद्ध लायब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में एक ऐतिहासिक ग्रंथ है ‘सायर-उल-ओकुल’। उसमें राजा विक्रमादित्य से संबंधित एक शिलालेख का उल्लेख है जिसमें कहा गया है कि ‘…वे लोग भाग्यशाली हैं, जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम के राज्य में जीवन व्यतीत किया। वह बहुत ही दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था, जो हरेक व्यक्त...

पोरस

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जितना बड़ा अन्याय और धोखा इतिहासकारों ने महान पौरस के साथ किया है उतना बड़ा अन्याय इतिहास में शायद ही किसी के साथ हुआ होगा।एक महान नीतिज्ञ,दूरदर्शी,शक्तिशाली वीर विजयी राजा को निर्बल और पराजित राजा बना दिया गया…. ग्रीक के फिल्म-निर्माता ओलिवर स्टोन ने कुछ हद तक सिकन्दर की हार को स्वीकार किया है..  अलेक्जेंडर फिल्म में दिखाया गया है कि एक तीर सिकन्दर का सीना भेद देती है और इससे पहले कि वो शत्रु के हत्थे चढ़ता उससे पहले उसके सहयोगी उसे ले भागते हैं इस फिल्म में ये भी कहा गया है कि ये उसके जीवन की सबसे भयानक त्रासदी थी और भारतीयों ने उसे तथा उसकी सेना को पीछे लौटने के लिए विवश कर दिया.. चूँकि उस फिल्म का नायक सिकन्दर है इसलिए उसकी इतनी सी भी हार दिखाई गई है तो ये बहुत है, नहीं तो इससे ज्यादा सच दिखाने पर लोग उस फिल्म को ही पसन्द नहीं करते..वैसे कोई भी फिल्मकार अपने नायक की हार को नहीं दिखाता है. अब देखिए कि भारतीय बच्चे क्या पढ़ते हैं इतिहास में–“सिकन्दर ने पौरस को बंदी बना लिया था..उसके बाद जब सिकन्दर ने उससे पूछा कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाय तो पौरस ने कहा कि उसके साथ वही कि...

चन्द्रगुप्त मोर्य

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चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसापूर्व को पाटलिपुत्र में हुआ था ,वह पहला मौर्य सम्राट था और अखंड भारत पर भी राज करने वाला  करने वाला पहला सम्राट था । जन्म से ही वह गरीब था ,उसके पिता की मृत्यु उसके जन्म से पहले ही हो गई थी.. चंद्रगुप्त मौर्य मोरिया नाम के काबिले से ताल्लुक रखता था जो शाक्यो के रिश्तेदार थे । 10 वर्ष की उम्र में उसकी माँ मुरा की मृत्यु हो गई थी और तब चाणक्य नाम के ब्राह्मण ने अनाथ चंद्रगुप्त को पाला । चाणक्य को धनानंद से बदला लेना था और नंद के भ्रष्ट राज को ख़त्म करना था । चाणक्य ने चंद्रगुप्त सम्राट जैसी बात देखि और इसीलिए वे उसे तक्षशिला ले गए । तक्षशिला में शिक्षा देने के बाद चाणक्य और चंद्रगुप्त ने पहले तो तक्षिला पर विजय पाई और आस पास के कई कबीलों और छोटे राज्यों को एक कर पाटलिपुत्र पर हमला किया । 320 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य मगध का सम्राट बन चूका था । इसके बाद उसने कई युद्ध लड़े और सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर एकछत्र राज किया । सिकंदर की मृत्यु के बाद उसकी सेनापति सेल्यूकस यूनानी साम्राज्य का शासक बना और उसने चंद्रगुप...

पुष्यमित्र शुंग

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मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पोत्र अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक ने एक बौध सम्राट के रूप में लग भाग २० वर्ष तक शासन किया। अहिंसा का पथ अपनाते हुए उसने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया। अत्यधिक अहिंसा के प्रसार से भारत की वीर भूमि बौद्ध भिक्षुओ व बौद्ध मठों का गढ़ बन गई थी। उससे भी आगे जब मोर्य वंश का नौवा अन्तिम सम्राट व्रहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा ,तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, पंजाब व लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था । जब सिकंदर व सैल्युकस जैसे वीर भारत के वीरों से अपना मान मर्दन करा चुके थे, तब उसके लगभग ९० वर्ष पश्चात् जब भारत से बौद्ध धर्म की अहिंसात्मक निति के कारण वीर वृत्ति का लगभग ह्रास हो चुका था, ग्रीकों ने सिन्धु नदी को पार करने का साहस दिखा दिया। सम्राट व्रहद्रथ के शासनकाल में ग्रीक शासक मिनिंदर जिसको बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है ,ने भारत वर्ष पर आक्रमण की योजना बनाई। मिनिंदर ने सबसे पहले बौद्ध धर्म के धर्म गुरुओं से संपर्क साधा,और उनसे कहा कि अगर आप भारत विजय में मेरा साथ दें तो मे...

कृष्णदेव राय

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एक के बाद एक लगातार हमले कर विदेशी मुस्लिमों ने भारत के उत्तर में अपनी जड़ें जमा ली थीं. अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को एक बड़ी सेना देकर दक्षिण भारत जीतने के लिये भेजा.1306 से 1315 ईसवी तक इसने दक्षिण में भारी विनाश किया. ऐसी विकट परिस्थिति में हरिहर और बुक्का राय नामक दो वीर भाइयों ने 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की. इन दोनों को बलात् मुसलमान बना लिया गया था; पर माधवाचार्य ने इन्हें वापस हिन्दू धर्म में लाकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना करायी. लगातार युद्धरत रहने के बाद भी यह राज्य विश्व के सर्वाधिक धनी और शक्तिशाली राज्यों में गिना जाता था. इस राज्य के सबसे प्रतापी राजा हुए कृष्णदेव राय. उनका राज्याभिषेक 8 अगस्त, 1509 को हुआ था. महाराजा कृष्णदेव राय हिन्दू परम्परा का पोषण करने वाले लोकप्रिय सम्राट थे. उन्होंने अपने राज्य में हिन्दू एकता को बढ़ावा दिया. वे स्वयं वैष्णव पन्थ को मानते थे; पर उनके राज्य में सब पन्थों के विद्वानों का आदर होता था. सबको अपने मत के अनुसार पूजा करने की छूट थी. उनके काल में भ्रमण करने आये विदेशी यात्रियों ने अपने वृत्तान्तों में विजयनगर साम्र...

शिवाजी

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शिवाजी भोसले मराठा साम्राज्य के महानतम राजा व संस्थापक थे।  भोंसले मराठा वंश से जयजयकार, वह अपनी राजधानी के रूप में रायगढ़ के साथ एक स्वतंत्र मराठा साम्राज्य बनाया। उन्हें बीजापुर के आदिलशाही सल्तनत और मुगल साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष में अग्रणी होने के लिए छत्रपति के रूप में ताज पहनाया गया था। वह एक महान योद्धा और मुगलों के खिलाफ भारत के सबसे एकजुट नायक के रूप में याद किया जाता है। कुछ चुनिन्दा लोगो का एक दल बनाकर उन्होंने उन्नीस वर्ष की आयु में ही पूना के निकट तीरण के दुर्ग पर अधिकार जमा लिया था .. 1. एक बार शिवाजी की सेना के एक सैनिक ने एक मुगल किलेदार की एक जवान और अति सुंदर युवती को उसके घर से उठा लिया और उसकी सुंदरता पर मुग्ध होकर उसने उसे शिवाजी के समक्ष पेश करने की ठानी. वह उस युवती को बिठाकर शिवाजी के पास ले गया. जब शिवाजी ने उस युवती को देखा तो वह उसकी सुंदरता की तारीफ किए बिना नहीं रह सके लेकिन उन्होंने उस युवती की तारीफ में जो कहा वह कुछ इस तरह से था  “ काश! हमारी माता भी इतनी खूबसूरत होतीं तो मैं भी खूबसूरत होता. ” इसके बाद वीर शिवाजी ने अपने सेनापति क...

महाराणा प्रताप

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इतिहास पुरुष महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को उदयपुर, मेवाड के कुम्भलगढ दुर्ग में हुआ था। वह सिसौदिया राजवंश में जन्में थे। उनकी ‘मां’ का नाम जैवन्ताबाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की पुत्री थीं। महाराणा प्रताप को बचपन में ‘कीका’ के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुन्दा में हुआ। महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियां की थीं। महाराणा प्रताप द्वितीय बुद्धिमत्ता एवं वीरता की मिसाल हैं। महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और प्रसिद्ध नीलवर्ण अरबी मूल के घोड़े का नाम चेतक था। हल्दी घाटी (1576) के युद्ध में उनके प्रिय घोड़े चेतक ने अहम भूमिका निभाई, इसके लिए उसे आज भी याद किया जाता है। वर्तमान में चित्तौड़ की हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है, जहां स्वयं प्रताप और उनके भाई शक्तिसिंह ने अपने हाथों से इस अश्व का दाह-संस्कार किया था। महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो और कवच का वजन भी 80 किलो था। महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना जो आज हल्दी घटी म...

पृथ्वीराज चौहान

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मोहम्मद गौरी की चित्ररेखा नामक एक दरबारी गायिका  रूपवान एवं सुन्दर स्त्री थी।  वह संगीत एवं गान विद्या में निपुण, वीणा वादक, मधुर भाषिणी और बत्तीस गुण लक्षण बहुत सुन्दर नारी थी।  शाहबुदीन गौरी का एक कुटुम्बी भाई था ‘‘मीर हुसैन’’ वह शब्दभेदी बाण चलाने वाला, वचनों का पक्का और संगीत का प्रेमी तथा तलवार का धनी था।  चित्ररेखा गौरी को बहुत प्रिय थी, किन्तु वह मीर हुसैन को अपना दिल दे चुकी थी और हुसैन भी उस पर मंत्र-मुग्ध था।  इस कारण गौरी और हुसैन में अनबन हो गई।  गौरी ने हुसैन को कहलवाया कि ‘‘चित्ररेखा तेरे लिये कालस्वरूप है, यदि तुम इससे अलग नहीं रहे तो इसके परिणाम भुगतने होंगें।’’  इसका हुसैन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ और वह अनवरत चित्ररेखा से मिलता रहा।  इस पर गौरी क्रोधित हुआ और हुसैन को कहलवाया कि वह अपनी जीवन चाहता है तो यह देश छोड़ कर चला जाए, अन्यथा उसे मार दिया जाएगा।  इस बात पर हुसैन ने अपी स्त्री, पुत्र आदि एवं चित्ररेखा के साथ अफगानिस्तान को त्यागकर पृथ्वीराज की शरण ली, उस समय पृथ्वीराज नागौर में थे।  शरणागत का हाथ पकड़कर सहारा और स...

रणजीत सिंह

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महाराजा रणजीत सिंह  (१७८०-१८३९) सिख साम्राज्य के राजा थे। वे  शेर-ए पंजाब  के नाम से प्रसिद्ध हैं। महाराजा रणजीत एक ऐसी व्यक्ति थे, जिन्होंने न केवल पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट रखा, बल्कि अपने जीते-जी अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं फटकने दिया। रणजीत सिंह का जन्म सन 1780 में गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन दिनों पंजाब पर सिखों और अफगानों का राज चलता था जिन्होंने पूरे इलाके को कई मिसलों में बांट रखा था। रणजीत के पिता महा सिंह सुकरचकिया मिसल के कमांडर थे। पश्चिमी पंजाब में स्थित इस इलाके का मुख्यालय गुजरांवाला में था। छोटी सी उम्र में चेचक की वजह से महाराजा रणजीत सिंह की एक आंख की रोशनी जाती रही। महज 12 वर्ष के थे जब पिता चल बसे और राजपाट का सारा बोझ इन्हीं के कंधों पर आ गया। 12 अप्रैल 1801 को रणजीत ने महाराजा की उपाधि ग्रहण की। गुरु नानक के एक वंशज ने उनकी ताजपोशी संपन्न कराई। उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और सन 1802 में अमृतसर की ओर रूख किया। महाराजा रणजीत ने अफगानों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं और उन्हें पश्चिमी पंजाब की ...