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Showing posts from February, 2013

ताना नहीं मिलता तो बम नहीं फेंकते भगत सिंह

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भारत के इतिहास में आठ अप्रैल एक महत्‍वपूर्ण तिथि है। 8 अप्रैल 1857 को जहां शहीद मंगल पांडेय को फांसी पर चढ़ाया गया था वहीं 8 अप्रैल 1929 को शहीद भगत सिंह ने लाहौर असेंबली पर बम फेंका था। इस तिथि पर वनइंडिया पेश कर रहा है दो-अलग अलग गाथायें। शहीद भगत सिंह के शहीदे आजम बनने की की कहानी भी कम रोचक नहीं है। शायद कम ही लोग जानते हैं कि यदि दोस्तों ने लड़की के साथ स बन्धों को लेकर ताना नहीं मारा होता तो लाहौर एसेंबली में आठ अप्रैल 1929 को बम फेंकने शहीद भगत सिंह नहीं जाते। वर्ष 1929 में अंग्रेजी सत्ता को भारत छोडऩे के लिये मजबूर करने के लिए लाहौर एसे बली में बम फेंकने की योजना बनायी गयी थी। इसकी कहानी भी अजब है। भगत ङ्क्षसह लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ते थे और उस समय एक सुंदर लड़की को उनसे प्रेम हो गया था। भगत सिंह के कारण वह भी क्रांतिकारी दल में शामिल हो गई थीं। मकसद सिर्फ एक था कि उसे भगत सिंह का साथ मिलता रहे। जब एसे बली में बम फेंकने की जि मेवारी देने की बात आई तो दल के नेता चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को यह जि मेदारी देने से मना कर दिया। आजाद यह मानते थे कि दल को भगत सिंह की बहुत ज...

गुरु गोबिन्द सिंह

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गुरु गोबिन्द सिंह ( जन्म: २२ दिसंबर १६६६, मृत्यु: ७ अक्टूबर १७०८) सिखों के दसवें एवं अन्तिम गुरु थे। उनका जन्म बिहार के पटना शहर में हुआ था । उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त ११ नवम्बर सन १६७५ को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों ( जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ १४ युद्ध लड़े। गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया और इसे ही सिखों को शाश्वत गुरू घोषित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।

गुरू तेग बहादुर सिंह

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तेग बहादुर सिंह या गुरू तेग बहादुर सिंह सिखों के एक गुरू थे । विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। "धरम हेत साका जिनि कीआ सीस दीआ पर सिरड न दीआ।" "धरम हेत साका जिनि कीआ सीस दीआ पर सिरड न दीआ।"इस महावाक्य अनुसार गुरुजी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए नहीं अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की खातिर बलिदान था। धर्म उनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन विधान का नाम था। इसलिए धर्म के सत्य शाश्वत मूल्यों के लिए उनका बलि चढ़ जाना वस्तुतः सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के पक्ष में एक परम साहसिक अभियान था। आततायी शासक की धर्म विरोधी और वैचारिक स्वतंत्रता का दमन करने वाली नीतियों के विरुद्ध गुरु तेग बहादुरजी का बलिदान एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक घटना थी। यह गुरुजी के निर्भय आचरण, धार्मिक अडिगता और नैतिक उदारता का उच्चतम उदाहरण था। गुरुजी मानवीय धर्म एवं वैचारिक स्वतंत्रता के लिए अपनी महान शहादत देने वाले एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे।

गुरू हर किशन

गुरू हर किशन साहिब जी का जन्म सावन वदी १० (८वां सावन) बिक्रम सम्वत १७१३ (७ जुलाई १६५६) को कीरतपुर साहिब में हुआ। वे गुरू हर राय साहिब जी एवं माता किशन कौर के दूसरे पुत्र थे। राम राय जी गुरू हरकिशन साहिब जी के बड़े भाई थे। रामराय जी को उनके गुरू घर विरोधी क्रियाकलापों एवं मुगल सलतनत के पक्ष में खड़े होने की वजह से सिख पंथ से निष्कासित कर दिया गया था।८ वर्ष की अल्प आयु में गुरू हर किशन साहिब जी को गुरुपद प्रदान किया गया। गुरु हर राय जी ने १६६१ में गुरु हरकिशन जी को अष्ठम्‌ नानक' गुरू के रूप में स्थापित किया। इस प्रकार से नाराज होकर राम राय जी ने औरंगजेब से इस बात की शिकायत की। इस बावत शाहजांह ने राम राय का पक्ष लेते हुए राजा जय सिंह को गुरू हर किशन जी को उनके समक्ष उपस्थित करने का आदेश दिया। राजा जय सिंह ने अपना संदेशवाहक कीरतपुर भेजकर गुरू को दिल्ली लाने का आदेश दिया। पहले तो गुरू साहिब ने अनिच्छा जाहिर की। परन्तु उनके गुरसिखों एवं राजा जय सिंह के बार-बार आग्रह करने पर वो दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गये।

गुरू हर राय

हर राय या गुरू हर राय सिखों के एक गुरू थे ।गुरू हरराय जी एक महान आध्यात्मिक व राष्ट्रवादी महापुरुष थे। वे एक महान योद्धा थे। उनका जन्म १६३० ईस्वीं में कीरतपुर रोपड़ में हुआ था। गुरू हरगोविन्द साहिब जी के ज्योति जोत समाने से पहले, अपने पोते हरराय जी को १४ वर्ष की छोटी आयु में ३ मार्च १६४४ को ÷सप्तम्‌ नानक' के रूप में स्थापित किया। गुरू हरराय साहिब जी बाबा गुरदित्ता जी एवं माता निहाल कौर जी के पुत्र थे। गुरू हरराय साहिब जी का विवाह माता किशन कौर जी, जो कि अनूप शहर (बुलन्दशहर), उत्तर प्रदेश के श्री दया राम जी की पुत्री थी, हर सूदी ३, सम्वत १६९७ को हुआ। गुरू हरराय साहिब जी के दो पुत्र- १. श्री रामराय जी, २. श्री हरकिशन साहिब जी (गुरू) थे।गुरू हरराय साहिब जी का शांत व्यक्तित्व लोगों को प्रभावित करता था। गुरु हरराय साहिब जी ने अपने दादा गुरू हरगोविन्द साहिब जी के सिख योद्धाओं के दल को पुनर्गठित किया। उन्होंने सिख योद्धाओं में नवीन प्राण संचारित किए। वे एक आध्यात्मिक पुरुष होने के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी थे। अपने राष्ट्र केन्द्रित विचारों के कारण मुगल औरंगजेब को परेशानी हो रही थी। औरंगज...

गुरू हरगोबिन्द सिंह

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हरगोबिन्द सिंह या गुरू हरगोबिन्द सिंह सिखों के एक गुरू थे । साहिब की सिक्ख इतिहास में गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र गुरु हरगोबिन्दसाहिबकी दल-भंजन योद्धा कहकर प्रशंसा की गई है। गुरु हरगोबिन्दसाहिब की शिक्षा दीक्षा महान् विद्वान् भाई गुरदास की देख-रेख में हुई। गुरु जी को बराबर बाबा बुड्डाजी का भी आशीर्वाद प्राप्त रहा। छठे गुरु ने सिक्ख धर्म, संस्कृति एवं इसकी आचार-संहिता में अनेक ऐसे परिवर्तनों को अपनी आंखों से देखा जिनके कारण सिक्खीका महान् बूटा अपनी जडे मजबूत कर रहा था। विरासत के इस महान पौधे को गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने अपनी दिव्य-दृष्टि से सुरक्षा प्रदान की तथा उसे फलने-फूलने का अवसर भी दिया। अपने पिता श्री गुरु अर्जुन देव की शहीदी के आदर्श को उन्होंने न केवल अपने जीवन का उद्देश्य माना, बल्कि उनके द्वारा जो महान कार्य प्रारम्भ किए गए थे, उन्हें सफलता पूर्वक सम्पूर्ण करने के लिए आजीवन अपनी प्रतिबद्धता भी दिखलाई।बदलते हुए हालातों के मुताबिक गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने शस्त्र एवं शास्त्र की शिक्षा भी ग्रहण की। वह महान योद्धा भी थे। विभिन्न प्रकार के शस्त्र चलाने का उन्हें अद्भुत अभ्यास था। ग...

गुरु अर्जन देव

गुरु अर्जन देव जी शहीदों के सरताज एवं शान्तिपुंजहैं। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है। गुरुग्रंथ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है। गणना की दृष्टि से श्री गुरुग्रंथ साहिब में सर्वाधिक वाणी पंचम गुरु की ही है।ग्रंथ साहिब का संपादन गुरु अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604में किया। ग्रंथ साहिब की संपादन कला अद्वितीय है, जिसमें गुरु जी की विद्वत्ता झलकती है। उन्होंने रागों के आधार पर ग्रंथ साहिब में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में दुर्लभ है। यह उनकी सूझबूझ का ही प्रमाण है कि ग्रंथ साहिब में 36महान वाणीकारोंकी वाणियां बिना किसी भेदभाव के संकलित हुई।

गुरू राम दास

राम दास या गुरू राम दास सिखों के गुरु थे ।उन दिनों जब विदेशी आक्रमणकारी एक शहर के बाद दूसरा शहर तबाह कर रहे थे, तब ÷पंचम्‌ नानक' गुरू राम दास जी महाराज ने एक पवित्र शहर रामसर, जो कि अब अमृतसर के नाम से जाना जाता है, का निर्माण किया। गुरू राम दास साहिब जी (जेठा जी) का जन्म चूना मण्डी, लाहौर (अब पाकिस्तान में) में कार्तिक वदी २, (२५वां आसू) सम्वत १५९१ (२४ सितम्बर, १५३४) को हुआ था। माता दया कौर जी (अनूप कौर जी) एवं बाबा हरी दास जी सोढी खत्री का यह पुत्र बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक था। राम दास जी का परिवार बहुत गरीब था। उन्हें उबले हुए चने बेच कर उन्हें अपनी रोजी रोटी कमानी पड़ती थी। जब वो मात्र ७ वर्ष के थे, उनके माता पिता की मृत्यू हो गयी। उनकी नानी उन्हें अपने साथ बसर्के गांव ले आयी। उन्होंने बसर्के में ५ वर्षों तक उबले हुए चने बेच कर अपना जीवन यापन किया। एक बार गुरू अमर दास साहिब जी रामदास साहिब जी की नानी के साथ उनके दादा की मृत्यू पर बसर्के आये और उन्हें राम दास साहिब से एक गहरा लगाव सा हो गया। रामदास जी अपनी नानी के साथ गोइन्दवाल आ गये एवं वहीं बस गये। यहां भी वे अपनी रोजी रोटी ...

गुरू अंगद देव

अंगद देव या गुरू अंगद देव सिखो के एक गुरू थे ।गुरू अंगद देव महाराज जी का सृजनात्मक व्यक्तित्व था। उनमें ऐसी अध्यात्मिक क्रियाशीलता थी जिससे पहले वे एक सच्चे सिख बनें और फिर एक महान गुरु। गुरू अंगद साहिब जी (भाई लहना जी) का जन्म हरीके नामक गांव में, जो कि फिरोजपुर, पंजाब में आता है, वैसाख वदी १, (पंचम्‌ वैसाख) सम्वत १५६१ (३१ मार्च, १५०४) को हुआ था। गुरुजी एक व्यापारी श्री फेरू जी के पुत्र थे। उनकी माता जी का नाम माता रामो जी था। बाबा नारायण दास त्रेहन उनके दादा जी थे, जिनका पैतृक निवास मत्ते-दी-सराय, जो मुख्तसर के समीप है, में था। फेरू जी बाद में इसी स्थान पर आकर निवास करने लगे।सनातनी मत की अपनी आध्यात्मिक माता के प्रभाव से भाई लहना जी ने दुर्गा (हिन्दू देवी) की पूजा करते थे। वो प्रतिवर्ष भक्तों के एक जत्थे का नेतृत्व कर ज्वालामुखी मंदिर जाया करता था। १५२० में, विवाह माता खीवीं जी से हुआ। उनसे उनके दो पुत्र - दासू जी एवं दातू जी तथा दो पुत्रियाँ - अमरो जी एवं अनोखी जी हुई। मुगल एवं बलूच लुटेरों (जो कि बाबर के साथ आये थे) की वजह से फेरू जी को अपना पैतृक गांव छोड़ना पड़ा। इसके पश्चात उ...

गुरू नानक

गुरू नानक आर्जुन् सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) है। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। 15 अप्रैल, 1469 अर्जुन अर्जुन् को तलवंडी नामक स्थान में, कल्यानचंद नाम के एक किसान के घर उत्पन्न हुए। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा। 7-8 साल की उम्र में स्कूल छूट गया और सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। 16 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह हुआ। श्रीचंद और लक्ष्मीचंद नाम के दो पुत्र भी इन्हें हुए। 1507 में ये अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर यात्रा के लिए निकल पड़े। 1521 तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। 1539 में इनकी मृत्यु हुई।गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे।नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्हांने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारो...

भगवान गौतम बुद्ध के अनमोल विचार

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Lord Buddha Name Gautam Buddha / भगवान गौतम बुद्ध Born 563 BC or 623 BCLumbini, today in Nepal Died 483 BC or 543 BC (aged 80)Kushinagar, today in India Quote 1 :  All that we are is the result of what we have thought. If a man speaks or acts with an evil thought, pain follows him. If a man speaks or acts with a pure thought, happiness follows him, like a shadow that never leaves him. In Hindi : हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है. यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम  करता है , तो उसे कष्ट ही मिलता है. यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो उसकी परछाई की तरह ख़ुशी उसका साथ कभी नहीं छोडती . Lord Buddha  भगवान गौतम बुद्ध  Quote 2 : Better than a thousand hollow words, is one word that brings peace. In Hindi : हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाये. Lord Buddha  भगवान गौतम बुद्ध  Quote 3 : All wrong-doing arises because of mind. If mind is transformed can ...

बौद्ध धर्म

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सिद्धांत buddh poornima गौतम बुद्ध के गुज़रने के बाद, बौद्ध धर्म के अलग-अलग संप्रदाय उपस्थित हो गये हैं, परंतु इन सब के कुछ सिद्धांत मिलते हैं - प्रतीत्यसमुत्पाद, चार आर्य सत्य, आर्य अष्टांग मार्ग, बोधि। प्रतीत्यसमुत्पाद - प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है । प्राणियों के लिये, इसका अर्थ है कर्म और विपाक (कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र । क्योंकि सब कुछ अनित्य और अनात्मं (बिना आत्मा के) होता है, कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है । हर घटना मूलतः शुन्य होती है । परंतु, मानव, जिनके पास ज्ञान की शक्ति है, तृष्णा को, जो दुःख का कारण है, त्यागकर, तृष्णा में नष्ट की हुई शक्ति को ज्ञान और ध्यान में बदलकर, निर्वाण पा सकते हैं । .... साँची का स्तूप 160 160 160 सांची का बौद्ध स्तूप युनेस्को विश्व धरोहर स्थल राष्ट्र 160 पार्टी 160 भारत प्रकार सांस्कृतिक मानदंड सन्दर्भ ५२४ क्षेत्र† एशिया-प्रशांत शिलालेखित इतिहास शिलालेख १९८९ 160 १३ वां सत्र नाम जो कि विश्व धरोहर सूचि में अंकित ह...