महर्षि दयानन्द


महर्षि दयानन्द के विचारों का महत्व:-


भारतीय नवजागरण के अग्रदूत महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रतिपादित विचारों की भारत की राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने तथा देश की अखण्डता की रक्षा में क्या उपयोगिता है, इस पर विचार करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि किसी राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता से क्या अभिप्राय है? यदि हम संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ वेदों का अवलोकन करें तो हमें विदित होता है कि वैदिक वाङ्‌मय में सर्वप्रथम राष्ट्र की विस्तृत चर्चा उपलब्ध होती है। अथर्ववेद के 12वें काण्ड का प्रथम सूक्त जो भूमि सूक्त या मातृभूमि की वन्दना के नाम से जाना जाता है, हमारे समक्ष राष्ट्र की परिपूर्ण तथा सुविचारित कल्पना प्रस्तुत करता है। इसे आप वेद का राष्ट्रीय गीत भी कह सकते हैं। वेदों में राष्ट्र के प्रति जैसी धारणा व्यक्त की गई है तथा उसके प्रति नागरिकों के जिन कर्त्तव्यों का निर्धारण किया गया उसे ही इन 63 मन्त्रों में सुस्पष्ट ढंग से परिभाषित किया गया है। इस सूक्त के सभी मन्त्र इतने गम्भीर तथा व्यापक हैं कि किसी भी देश का वासी इनके अर्थों का चिन्तन कर एक सच्चा और अच्छा नागरिक बन सकता है। यहॉं यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यद्यपि एक देश के निवासियों के आचार-विचार, खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा-भाषा आदि में भिन्नता हो सकती है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि इन्हीं विभिन्नताओं के कारण राष्ट्र और धरती की एकता तथा अखण्डता पर आंच आए।
जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथिवी यथौकसम्‌।।
यह धरती नाना प्रकार की बोलियों को बोलने वालों तथा नाना पेशों से जीविका चलाने वाले लोगों को उसी प्रकार धारण करती है मानो वे एक ही घर के लोग हों। भाषा तथा व्यवसायगत भेद पृथ्वी के नागरिकों में भिन्नता तथा अनेकता नहीं लाते। महर्षि दयानन्द ने वेद प्रतिपादित इसी तथ्य को हृदयंगम किया था और वे पृथ्वी के समस्त नागरिकों को एक ही परिवार का सदस्य मानते थे। इसलिए उन्होंने अपने द्वारा स्थापित आर्यसमाज का उद्देश्य किसी देश, सम्प्रदाय तथा वर्ग, वर्ण का कल्याम करना नहीं बताया अपितु संसार के उपकार को ही इस संस्था का लक्ष्य ठहराया था।
राष्ट्र की परिभाषा अनेक प्रकार से की गई है। किन्तु अधिकांश विचारकों की राय में राष्ट्र उस भौगोलिक इकाई का नाम है, जिसकी सीमाएं बहुत कुछ प्राकृतिक होती है तथा जिसके निवासियों के इतिहास, संस्कृति, परम्परा, जीवनदर्शन तथा आचार व्यवहार में एकरूपता दिखाई देती है। यों तो कोई भी राष्ट्र धरती का एक टुकड़ा ही होता है जिसमें नदी, पर्वत, नाले, झरने, वन, मैदान आदि के अतिरिक्त मनुष्यों द्वारा निर्मित बस्तियॉं भी होती हैं किन्तु उस भूभाग की सांस्कृतिक एकता ही वह मूलभूत तत्व है जो इस भूखण्ड को राष्ट्र की संज्ञा प्रदान करता है। इस प्रसंग में पृथ्वी सूक्त का निम्न मन्त्र मननीय है-
शिला भूमिरश्मा पांसुः सा भूमिः संधृता धृता।
अर्थात्‌ प्रत्यक्षतया तो यह धरती विभिन्न चट्‌टानों मिट्टी के कणों, प्रस्तर खण्डों तथा बालू रेत का ही समष्टि रूप है किन्तु जब यही भूखण्ड देशवासियों द्वारा सुसंस्कृत बनाकर सम्यक्‌तया धारण किया जाता है तो उसके साथ देश की गौरवमयी संस्कृति तथा इतिहास के गरिमामय प्रसंग जुड़ जाते हैं। तब प्रस्तरमयी शिलाओं तथा धूल के कणों वाली यह धरती हमारे लिए वन्दनीय तथा रक्षणीय राष्ट्र बन जाता है। इसी वैदिक तथ्य को अनुभव कर महर्षि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में सर्वत्र स्वदेश आर्यावर्त का कीर्तिगान किया है और इसके विगत ऐश्वर्य, वैभव तथा गौरव का उन्मुक्त कण्ठ से गान किया है। देशवासियों को स्वराष्ट्र के प्रति कर्त्तव्योन्मुख किया है। उनके अनुसार जिस देश के अन्न-जल से हमारा पालन हुआ है, क्या उसके प्रति हमारा कोई दायित्व और कर्त्तव्य नहीं है? स्वदेश में स्वराज्य की स्थापना का अपना पावन कर्त्तव्य बताते हुए उन्होंने लिखा था, ""चाहे कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। किन्तु विदेशियों का राज्य कितना ही मतामतान्तर के आग्रह से शून्य, न्याय-युक्त तथा माता-पिता के समान दया तथा कृपायुक्त ही क्यों न हो, कदापि श्रेयस्कर नहीं हो सकता।'' सत्यार्थप्रकाश, अष्टम समुल्लास।
इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि राष्ट्र की सुस्पष्ट धारणा से पुराकालीन आर्य लोग सर्वथा परिचित थे। इस प्रसंग में यह लिखना भी आवश्यक है कि हमारे विदेशी शासकों ने इस तथ्य को कभी स्वीकार नहीं किया कि भारत सुसंगठित तथा सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया एक राष्ट्र है। इस विचारधारा को देश के नागरिकों में प्रचारित करने के पीछे उनका एक गुप्त एजेण्डा था। उनके निहित गोपनीय स्वार्थ। वे नहीं चाहते थे कि भारत के निवासी अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को पहचानें तथा एकता के सूत्र में बन्धकर स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए सामूहिक उद्योग करें। अपने इस स्वार्थ की पूर्ति के लिए वे वहॉं के निवासियों को सदा यही पाठ पढ़ाते रहे कि भारत के आदिम निवासी तो कोल, भील, द्रविड़ जातियों के लोग थेजो कबीलों में रहते थे और उन्नतिशील आर्यों से उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं था। महर्षि दयानन्द ने पश्चिमी लोगों द्वारा प्रवर्तित इस मिथक को तोड़ा तथा इस बात को बलपूर्वक प्रतिपादित किया कि आर्य लोग ही आर्यावर्त के आदि निवासी थे। उनके बसने के पहले इस देश में अन्य किसी जाति का निवास नहीं था। उन्होंेने आर्यों और द्रविड़ों में धर्मगत भेद को नहीं माना। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लिखे गये इतिहासों से उत्पन्न भ्रान्तियों का प्रबल खण्डन किया और भारत के वास्तविक इतिहास के अनेक गौरवपूर्ण प्रसंगों को उजागर किया।
यदि हम आर्यों के विगत इतिहास को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस देश के विदेशी दासता के काल को छोड़कर अत्यन्त प्राचीन काल में देश की एकता को मजबूत करने का प्रयत्न यहॉं सदा होते रहे हैं। महाभारत काल को ही देखें। उस समय इस देश को विखण्डित करने के अनेक कारण उत्पन्न हो गये थे। अन्यायी, अत्याचारी, पराये स्वत्व को छीनने वाले क्षुद्रमनस्क शासकों के पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष के वशीभूत होकर हमारी प्रजा अत्यन्त पीड़ा तथा त्रास का अनुभव कर रही थी। उस समय कृष्ण जैसे महामनस्वी, नीतिज्ञ प्रज्ञापुरुष ने आर्य राष्ट्र के संरक्षण तथा नवनिर्माण की कल्पना को साकार किया। उन्होंने ही धर्मराज युधिष्ठिर को आर्यावर्त का एकछत्र सम्राट्‌ घोषित कराने का पुरुषार्थ किया तथा आसेतु हिमाचल भारत को एक अखण्ड राष्ट्र बनाया। महर्षि दयानन्द ने उस युगपुरुष को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए सर्वथा उपयुक्त ही लिखा था- ""देखो! महाभारत में कृष्ण का जीवन अत्युत्तम रीति से वर्णित हुआ है। उन्होंने जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त कोई अधर्म का काम नहीं किया था।''
इसी प्रकार समय-समय पर देश की आजादी तथा अखण्डता को सुरक्षित रखने के लिए महामति चाणक्य तथा समर्थ रामदास जैसे मनस्वी पुरुषों ने सम्राट्‌ चन्द्रगुप्त तथा हिन्दू पद पादशाही के आदर्श को क्रियान्वित करने वाले शिवाजी महाराज को प्रेरित किया। उधर महाराणा प्रताप, वीर दुर्गादास तथा दशम गुरु गोविन्दसिंह ने अत्याचारी केन्द्रीय शासकों से अपने राज्यों को स्वाधीन रखने के लिए सर्वोच्च वीरता तथा त्याग के अप्रतिम आदर्श रखे। ऋषि दयानन्द ने इन सभी इतिहास पुरुषों के राष्ट्रीय एकता में योगदान को आदर के साथ स्मरण किया है।
यों तो इस्लामी आक्रमणकारियों के समय से ही देश की एकता तथा अखण्डता को क्षति पहुंचने लगी थी, क्योंकि इन विदेशी हमलावरों की असहिष्णु नीति के कारण यहॉं के निवासी हिन्दुओं में असुरक्षा के भाव पैदा हो गये थे। जो हिन्दू अपने मत का त्याग कर इस्लाम को स्वीकार कर लेते, उन्हें सुरक्षा दी जाती थी, जबकि स्वधर्म पर स्थित रहने वालों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनने के लिए मजबूर किया जाता। उन्हें जजिया नाम का कर देना पड़ता तथा अपनी मर्जी के अनुसार पूजा उपासना के उनके मौलिक अधिकार भी छीने जाने लगे। इन्हीं तथ्यों को दृष्टिगत रखकर महर्षि दयानन्द ने मध्यकाल के असहिष्णु इस्लामी शासकों की कठोर साम्प्रदायिक नीतियों का विरोध किया। अपेक्षाकृत उन्होंने अंग्रेजी राज्य की इसलिए सराहना की है कि इस राज्य में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुकूल धर्मपालन करने की स्वतन्त्रता है तथा राजनैतिक पराधीनता होने पर भी देशवासी बहुत कुछ सुरक्षित जीवन बिता रहे हैं।
शताब्दियों के पश्चात्‌ राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता को साकार करने का एक अवसर हमें तब मिला जब यूरोपीय जातियों के सम्पर्क में आकर भारत में नवजागरण की स्फूर्तिमयी लहर उत्पन्न हुई। राजा राममोहन राय को नवजागरण का अग्रदूत कहा गया है। उन्होंने धर्म के क्षेत्र में वैदिक एकेश्वरवाद की पुनः स्थापना की। उन्होंने मध्यकालीन पौराणिक विश्वासों से उत्पन्न बहुदेववाद का प्रबल खण्डन किया तथा वेदों में निहित एकेश्वरवाद के सिद्धान्त को ही आर्यों का मूलभूत सिद्धान्त ठहराया। आलोचकों का तो कहना है कि राम मोहन राय द्वारा एकेश्वरवाद का प्रतिपादन एक मजबूरी थी, क्योंकि उन्हें ईसाइयत तथा इस्लाम में स्वीकृत एकेश्वरवाद की प्रतिद्वन्द्विता में हिन्दू एकेश्वरवाद को सिद्ध करना था। किन्तु यह आक्षेप सर्वथा मिथ्या तथा अन्यायपूर्ण है। ईसाइयत में तो पिता-पुत्र तथा पवित्रात्मा का त्रैत स्वीकार किया गया है, जबकि इस्लाम में अल्लाह की एकता पर जोर देने के साथ-साथ मोहम्मद के पैगम्बर होने की स्वीकृति आवश्यक समझी गई है। यथार्थतः राममोहन राय ने जिस एकेश्वरवाद का प्रतिपादन किया था वह वैदिक, औपनिषदिक तथा वेदान्त दर्शन पर आधारित एक सर्वोच्च सच्चिदानन्द सत्ता को स्वीकार करना ही था, किन्तु वह शंकर के एकेश्वरवाद तथा अद्वैतवाद से सर्वथा भिन्न था। ऋषि दयानन्द ने भी इसी प्रकार के एकेश्वरवाद को आर्य दर्शन के सर्वथा अनुकूल ठहराया तथा इसे देश की एकता के लिए अनिवार्य बताया।
राममोहन राय के प्रारम्भिक प्रयत्नों के पश्चात्‌ महर्षि दयानन्द ने ही देश की स्वतन्त्रता, एकता तथा अखण्डता के स्वर्णिम सूत्रों को प्रस्तुत किया। उन्होंने स्वधर्म, स्वसंस्कृति तथा स्वभाषा की एकता को राष्ट्रीय एकता के मजबूत स्तम्भ माना। उदयपुर प्रवास के समय पं. मोहनलाल विष्णुलाल पण्ड्‌या द्वारा पूछने पर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि जब तक देश के निवासियों में भाषागत, उपासनागत तथा विचारगत एकता नहीं होगी तब तक समग्र राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता स्वप्नवत अयथार्थ ही रहेगी। महर्षि दयानन्द के इस मन्तव्य का चिन्तन तथा तदनुकूल आचरण आज की प्रबल आवश्यकता है।

ऋषि दयानन्द का स्वलिखित जीवनवृत - (तृतीय लेख)


1913 वि. अगले पाँच मास में कानपुर व प्रयाग के मध्यवर्ती अनेक प्रसिद्ध स्थान मैंने देखे | भाद्रपद के प्रारम्भ में मिर्जापुर पहुँचा | वहाँ एक मास से अधिक विंध्याचल अशोलजी के मन्दिर में निवास किया | असूज के आरम्भ में काशी पहुँचा | वहाँ जाके मैं उस गुफा में ठहरा जो वरणा और गंगा के संगम पर है | और जो उस समय भवानन्द सरस्वती के अधिकार में थी | वहाँ पर कई शास्त्रियों अर्थात काकाराम, राजाराम आदि से मेरा परिचय हुआ परन्तु वहाँ केवल 12 दिन रहा |
(अब गतांक से आगे )
तत्पश्चात जिस वस्तु की खोज में था उसके अर्थ आगे को चल दिया | और असूज सुदि 2 स्. 1913 को दुर्गाकुण्ड के मन्दिर पर जो चण्डालगढ़ में है, पहुँचा | वहाँ दस दिन व्यतीत किये | यहाँ मैंने चावल खाने सर्वदा छोड़ दिये और केवल दूध पर अपना निर्वाह करके दिन रात योग विद्या के अध्य्यन और अभ्यास में तत्पर रहा | दौर्भाग्यवश वहाँ मुझे एक बड़ा दोष लग गया, अर्थात भांग पीने का स्वभाव हो गया | सो कई बार उसके प्रभाव से मैं बेसुध हो जाया करता | एक दिन मंदिर से निकल कर चण्डालगढ़ के निकटस्थ जो एक ग्राम आता था तो एक पुराना साथी मिला | ग्राम के दूसरी ओर कुछ ही दूर शिवालय था | वहाँ जाकर मैंने रात काटी | रात्रि के समय भांग से उत्पन्न हुई मादकता के कारण जब मैं अचेत सोता था तो मैने एक स्वप्न देखा | वह ऐसे था | मुझे विचार हुआ कि मैंने महादेव और उसकी स्त्री पार्वती को देखा | वे परस्पर वार्त्तालाप कर रहे थे और उनकी बातों का पात्र मैं था , अर्थात मेरे ही सम्बन्ध में वे कह रहे थे | पार्वती महादेव जी से कहती थी " उत्तम हो यदि दयानन्द सरस्वती का विवाह हो जावे " परन्तु देवता इससे भेद प्रकट कर रहे थे और उनका संकेत भांग की ओर था | मैं जागा और स्वप्न पर विचार करने लगा | तब मुझे बड़ा दुख और क्लेश हुआ | उस समय धारासार वर्षा हो रही थी | मैंने उस बरामदे में जो मन्दिर के मुख्य द्वार के सन्मुख था विश्राम किया | वहाँ नन्दी वृष देवता की एक विशाल मूर्ति खड़ी थी | अपने वस्त्र और पुस्तकादि उसकी पृष्ठ पर रख कर मैं उसके पीछे बैठ गया और निज विचार में निमग्न हुआ | सहसा नन्दी मूर्ति के भीतर दृष्टिपात करने पर मुझे विदित हुआ कि एक मनुष्य उसमें छिपा हुआ है | मैंने अपना हाथ उसकी और फैलाया | इससे वह अति भयभीत हुआ, क्योंकि मैंने देखा कि उसने तत्काल छलांग मारी और छलांग मारते ही वेग से ग्राम की और भागा | तब उसके जाने पर मैं उस ही मूर्ति के भीतर बैठ गया और अवशिष्ठ रात्रि भर वहाँ सोता रहा | प्रातः काल एक वृद्धा वहाँ आई | उसने वृष देवता की पूजा की, जिस अवस्था में कि मैं भी उसके अन्दर ही बैठा हुआ था | कुछ देर पीछे वह गुड़‌ और दही लेकर लौटी | मेरी पूजा करके और भ्रान्ति से मुझे ही देवता समझकर उसने कहा, " आप इसे ग्रहण कीजिये और इसमें से कुछ खाइये |" मैंने क्षुधार्त्त‌ होने के कारण वह सब खा लिया | दही क्योंकि बहुत खट्टा था , अतः भांग की मादकता को दूर करने में एक अच्छा निदान हो गया | उससे मादकता जाती रही और मुझे बहुत आराम प्रतीत हुआ |
चैत्र 1914 वहाँ से आगे चला और वह मार्ग पकड़ा कि जिस और पर्वत थे और जहाँ से नर्मदा निकलती है, अर्थात नर्मदा के स्त्रोत की और यात्रा आरम्भ की | मैंने कभी एक बार भी किसी से मार्ग नहीं पूछा प्रत्युत दक्षिण ओर यात्रा करता हुआ चला गया | शीघ्र ही मैं एक ऐसे उजाड़, निर्जन स्थान में पहुँच गया जहाँ चारों ओर बहुत घने वन और जंगल थे | वहाँ जंगल में अनियमित दूरी पर बिना क्रम झाड़ियों के मध्य में कई स्थानों पर मलिन और उजाड़ झोपड़ियाँ थीं | कहीं कहीं पृथक पृथक ठीक झोपड़ियाँ भी दृष्टिगोचर होती थीं | उन झोपड़ियों में से एक पर मैंने किंचित् दुग्धपान किया और पुनः आगे की और चल दिया | परन्तु इसके आगे लगभग पौन कोस चलकर मैं पुनः एक ऐसे ही स्थान पर पहूँचा जहाँ कोई प्रसिद्ध मार्ग दिखाई न देता था | अब मेरे लिये यही उचित प्रतीत होता था कि उन छोटे छोटे मार्गों में से (जिन्हें मैं न जानता था कि कहाँ जाते हैं) कोई एक चुनूँ और उस ओर चल दूँ |सुतरां मैं शीघ्र ही एक निर्जन वन में प्रविष्ट हुआ | उस जंगल में बेरियों के बहुत वृक्ष थे | परन्तु घास इतना घना और लम्बा था कि मार्ग सर्वथा दृष्टिगोचर न होता था | वहाँ मेरा सामना एक बड़े काले रीछ से हुआ | वह पशु बड़े वेग और उच्च स्वर‌ से चीखा | चिंघाड़ कर अपनी पिछली टांगों पर खड़ा हो मुझे खाने के निमित्त उसने अपना मुख खोला | कुछ काल तक मैं निष्क्रिय स्तब्धवत् खड़ा रहा | पश्चात शनैः शनैः मैंने अपने सोटे को उसकी ओर उठाया | उससे भयभीत हो वह उलटे पाँव लौट गया | उसकी चिंघाड़ व गर्ज ऐसी बलपूर्ण थी कि ग्राम वाले जो मुझे अभी मिले थे, दूर से उसका शब्द सुनकर लठ ले शिकारी कुत्तों सहित मेरी रक्षार्थ वहाँ आये | उन्होंने मुझे यह समझाने का परिश्रम किया कि मैं उनके साथ चलूँ | वे बोले, "इस जंगल में यदि तुम कुछ भी आगे बढ़ोगे तो तुम्हें संकटों का सामना करना पड़ेगा | पर्वत या वन में बहुत से भयानक क्रूर और हिंसक जंगली पशु अर्थात रीछ, हाथी, शेर आदि तुमको मिलेंगे |" मैंने उनसे निवेदन किया कि आप मेंरे कुशल मंगल का कुछ भय न करें क्योंकि मैं कुशल मंगल और रक्षित हूँ | मेरे मन में तो यही सोच थी कि किसी प्रकार नर्मदा का स्त्रोत देखूँ | अतः समस्त भय और कष्ट मुझे अपने संकल्प से न रोक सकते थे | जब उन्होंने देखा कि उनकी भयानक बातें मेरे लिये कोई भय उत्पन्न नहीं करती और मैं अपने संकल्प में पक्का हूँ तो उन्होंने मुझे एक दण्ड दिया जो मेरे सोटे से बड़ा था और जिससे मैं अपनी रक्षा करूँ | मैंने उस दण्ड को तुरन्त अपने हाथ से फेंक दिया |
उस दिन जब तक कि संसार में चारों ओर अन्धकार न छाया मैं बराबर यात्रा करता हुआ चला गया | कई घण्टों तक मानव बस्ती का मुझे कोई चिह्न न मिला | दूर दूर तक कोई ग्राम दिखाई न दिया | कोई झोंपड़ी भी तो दृष्टिगोचर न होती थी और न ही कोई मनुष्य जाति मेरी आँखों के सामने आई | पर वह वस्तुएँ जो प्रायः मेरे मार्ग मे आईं, वृक्ष थे | उनमें से अनेक टूटे पड़े थे कि जिनकी जड़ों को मस्त हाथियों ने तोड़ और उखेड़ कर फेंक दिया था | इससे कुछ दूर आगे एक विशाल विकट वन दिखाई दिया | उसमें प्रवेश करना कठिन था अर्थात बेर आदि कांटे वाले वृक्ष इतने घने लगे हुए थे कि उनके भीतर से निकल कर वन में पहुँचना अति दुस्तर प्रत्युत असम्भव प्रतीत होता था | प्रथम तो मुझे उसके भीतर से निकलना असम्भव दिखाई दिया परन्तु पीछे पेट के बल और जानू के सहारे मैं शनैः शनैः सर्पवत् उन वृक्षों से निकला और इस प्रकार इस यात्रा और कठिनाई पर विजय प्राप्त की | इस दिग्विजय के प्राप्त करने में मुझको अपने शरीर के मांस को भी भेंट करना पड़ा | मैं इसमें से घायल और अधमरा होकर निकला | उस समय सर्वत्र अन्धकार छाया हुआ था | तम के अतिरिक्त कुछ दृष्टिगोचर न होता था | यद्यपि मार्ग रुका हुआ था और दिखाई न देता था तो भी मैं आगे बढ़ने के विचार को रोक न सकता था | मैं इस आशा में था कि कोई मार्ग निकल ही आवेगा | अतएव निरन्तर आगे को चलता गया और बढ़ता रहा | अन्त को मैं एक ऐसे भयानक स्थान में पहुँचा कि जहाँ चारों और उच्च शैल और पर्वत थे कि जिन पर घनीं औषधियाँ और वमस्पतियाँ उगी हुई थीं | परन्तु इतना अवश्य था कि मनुष्यवास के वहां कुछ कुछ चिह्न और संकेत पाये जाते थे | अस्तु | शीघ्र ही मुझे कई झोंपड़ियां और कुटियायें दिखाई पड़ीं | उनके चारों और गोबर के ढेर लगे हुये थे | निकट ही स्वच्छ जल की एक छोटी सी नदी थी | उसके तीर पर बहुत सी बक‌रियां चर रहीं थीं | झोपड़ियों और टूटे फूटे घरों के द्वारों और छिद्रों में से टिम‌टिमाता हुआ प्रकाश दिखाई देता था जो जाते हुये पथिक को स्वागत और बधाई के शब्द सुनाता हुआ प्रतीत होता था | मैंने वहां एक विशाल वृक्ष के नीचे जो एक झोंपड़ी के ऊपर फैला हुआ था रात्रि व्यतीत की | प्रातः उठ कर अपने क्षत पांव, हाथ, और दण्ड को नदी जल से धोकर संध्या वा प्रार्थना के लिये बैठने को ही था कि किसी जंगली पशु की गर्ज मेरे कर्ण गोचर हुई | वह ध्वनि 'टमटम ' का उच्च स्वर था | कुछ काल पश्चात मैंने एक बड़ी सवारी या जन समूह को आते हुये देखा | उसमें बहुत से स्त्री पुरुष और बालक थे | उनके पीछे बहुत सी गौएं और बकरियां थीं | वे एक झोंपड़ी या घर से निकले | अनुमान है कि वे किसी धार्मिक त्यौहार की रस्में पूरी करने के लिए जो रात्रि को हुआ, आये थे | जब उन्होंने मेरी ओर देखा और मुझे उस स्थान में एक अजान पुरुष जाना तो बहुत से मेरे चारों ओर एकत्र हुये | अन्ततः एक वृद्ध पुरुष ने आगे बढ़क‌र मुझसे पूछा तुम कहां से आये हो ? मैंने उन सबसे कहा कि मैं काशी से आया हूँ और अब नर्मदा नदी के स्त्रोत की और यात्रा के लिये जा रहा हूं | इतना पूछ कर वे सब मुझे अपनी उपासना करने में निमग्न छोड़ कर चले गये | उनके जाने के आधा घण्टा पश्चात उनका एक अध्यक्ष दो पर्वतीय पुरुषों सहित मेरे पास आया और एक दिशा में बैठ गया | वह वस्तुत: उन सबकी ओर से प्रतिनिधि बन कर मुझे अपनी झोंपड़ियों में बुलाने को आया था परन्तु पूर्ववत् मैंने अब भी उनका निमन्त्रण अस्वीकार किया क्योंकि वे सब मूर्तिपूजक थे | तब उसने अपने साथ वालों को मेरे समीप अग्नि प्रज्वलित करने का आदेश किया | और दो पुरुषों को स्थापित किया कि रात्रि भर मेरी रक्षा करते हुये जागते रहें | जब उसने मुझसे मेरे भोजन के सम्बन्ध में पूछा और मैंने उसे बताया कि मैं केवल दूध पीकर निर्वाह करता हूं तो उस दयावान अध्यक्ष व नेता ने मुझसे मेरा तूंबा मांगा | उसे लेकर वह अपनी कुटी को गया और वहां से उसे दूध से भरकर मेरे पास भेज दिया | मैंने उस रात्रि उसमें से थोड़ा सा दूध पिया | वह फिर मुझे उन पहरा देने वालों के ध्यान में छोड़ कर लौट गया | उस रात्रि मैं घौर निद्रा में सोया और सूर्योदय तक सोता रहा | तत्पश्चात अपने संध्या आदि से अवकाश प्राप्त करके मैं उठा और यात्रा के लिये चला |

मूर्तिपूजा से कोई सन्धि नहीं:-

"एक बार रायबहादुर श्यामसुन्दरलाल ने महाराज (= स्वामी दयानन्द) से कहा कि आप मूर्तिपूजा पर इतना तीव्र आक्रमण क्यों करते हैं, उसे थोड़ा-सा नम्र कर देने से भी तो कार्य चल सकता है ? महाराज ने उत्तर दिया कि हम भी जानते हैं कि मूर्तिपूजा पर आक्रमण का वेग कुछ कम करने से अनेक लोग हमारे पक्ष में आ सकते हैं और हमारे प्रति निन्दा और अत्याचार भी कुछ कम हो जाएगा, किन्तु इससे हमारे व्रत का उद्देश्य शीघ्र ही शिथिल हो जाएगा और हमारे कार्य की स्वतन्त्रता शीघ्र ही विलुप्त हो जाएगी । मूर्तिपूजा पर मृदु आक्रमण करने से वा उससे किसी प्रकार की सन्धि करने से हमारे सिद्धान्तों की भी वही दशा होगी, जो अन्य सिद्धान्तों की हुई है और समयान्तर में आर्यसमाज पौराणिक होकर हिन्दुओं में मिल जाएगा ।"
(सन्दर्भ ग्रन्थः महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन-चरित, मूल लेखक-पं० देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, अनुवादक-पं० घासीराम, सम्पादक-स्वामी जगदीश्वरानन्द, प्रकाशक-गोविन्दराम हासानन्द-दिल्ली, प्रथम संस्करण, २०५० वि०सम्वत्, पृष्ठ-४५०)
उक्त प्रसंग पर स्वामी दयानन्द के जीवन-कार्य के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् इतिहासज्ञ लेखक श्री डॉ० भवानीलाल भारतीय ने लिखा है -
"राय बहादुर श्यामसुन्दरलाल की यह भी धारणा थी कि यदि महर्षि मूर्तिपूजा के प्रति तीव्र आक्रामक रवैया अखित्यार न करें और इस प्रचलित विश्वास का खण्डन मृदु शैली में करें, तो सम्भवतः उन्हें अधिक संख्या में अनुयायी मिल सकेंगे । महर्षि दयानन्द ने इसके उत्तर में स्पष्ट किया कि बुराइयों और कुरीतियों से समझौता करना समस्या का समाधान नहीं है । वे यह अनुभव करते थे कि यदि मूल सिद्धान्तों को लेकर विभिन्न सम्प्रदायों से समझौता कर लिया जाता है तो आर्यसमाज का क्रान्तिकारी स्वरूप समाप्त हो जाएगा और कालान्तर में वह हिन्दू धर्मरूपी उसी विशाल अजगर के उदर में समा जाएगा, जैसे अतीत के अनेक प्रगतिशील एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन समा गये हैं ।"

दयानन्दे आजम : प्रणेता: महात्मा उत्तम चन्द शरर‌:-


दयानन्द की महानता की ऊँचाइयों का निरुपण काव्यात्मक शैली में क्या ही सुन्दर ढंग से किया गया है जो महात्मा उत्तम चन्द शरर की काव्य कलात्मकता, ओजस्विता, विचारों के गम्भीर्य तथा उनकी दयनन्द पर श्रद्धा व आस्था का परिचायक है :
दयानन्दे आजम :
आबशारों से तरन्नुम तो घटाओं से खूमार
सोज बिजली से तो सूरज से तमाजत ले ली
हौसला धरती से आकाश से वसूअत ले ली
रोशनी और तब्ब्सुम मह ओ अजुम से लिया
ली समन्दर से जो गहराई तो फूलों से हंसी
नगमा बुल बुल से पहाड़ों से बुलन्दी ले ली
सारे अजजा को मुहब्बत में शराबूर किया
तब तक तड़पता हुआ दिल बन पाया
और उस दिल के लिए "मूल" बेदार हुए
दुनियाँ वालों को "दयानन्द" के दीदार हुए |


महर्षि दयानन्द के विचारों का महत्व:-


भारतीय नवजागरण के अग्रदूत महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रतिपादित विचारों की भारत की राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने तथा देश की अखण्डता की रक्षा में क्या उपयोगिता है, इस पर विचार करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि किसी राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता से क्या अभिप्राय है? यदि हम संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ वेदों का अवलोकन करें तो हमें विदित होता है कि वैदिक वाङ्‌मय में सर्वप्रथम राष्ट्र की विस्तृत चर्चा उपलब्ध होती है। अथर्ववेद के 12वें काण्ड का प्रथम सूक्त जो भूमि सूक्त या मातृभूमि की वन्दना के नाम से जाना जाता है, हमारे समक्ष राष्ट्र की परिपूर्ण तथा सुविचारित कल्पना प्रस्तुत करता है। इसे आप वेद का राष्ट्रीय गीत भी कह सकते हैं। वेदों में राष्ट्र के प्रति जैसी धारणा व्यक्त की गई है तथा उसके प्रति नागरिकों के जिन कर्त्तव्यों का निर्धारण किया गया उसे ही इन 63 मन्त्रों में सुस्पष्ट ढंग से परिभाषित किया गया है। इस सूक्त के सभी मन्त्र इतने गम्भीर तथा व्यापक हैं कि किसी भी देश का वासी इनके अर्थों का चिन्तन कर एक सच्चा और अच्छा नागरिक बन सकता है। यहॉं यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यद्यपि एक देश के निवासियों के आचार-विचार, खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा-भाषा आदि में भिन्नता हो सकती है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि इन्हीं विभिन्नताओं के कारण राष्ट्र और धरती की एकता तथा अखण्डता पर आंच आए।
जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथिवी यथौकसम्‌।।
यह धरती नाना प्रकार की बोलियों को बोलने वालों तथा नाना पेशों से जीविका चलाने वाले लोगों को उसी प्रकार धारण करती है मानो वे एक ही घर के लोग हों। भाषा तथा व्यवसायगत भेद पृथ्वी के नागरिकों में भिन्नता तथा अनेकता नहीं लाते। महर्षि दयानन्द ने वेद प्रतिपादित इसी तथ्य को हृदयंगम किया था और वे पृथ्वी के समस्त नागरिकों को एक ही परिवार का सदस्य मानते थे। इसलिए उन्होंने अपने द्वारा स्थापित आर्यसमाज का उद्देश्य किसी देश, सम्प्रदाय तथा वर्ग, वर्ण का कल्याम करना नहीं बताया अपितु संसार के उपकार को ही इस संस्था का लक्ष्य ठहराया था।
राष्ट्र की परिभाषा अनेक प्रकार से की गई है। किन्तु अधिकांश विचारकों की राय में राष्ट्र उस भौगोलिक इकाई का नाम है, जिसकी सीमाएं बहुत कुछ प्राकृतिक होती है तथा जिसके निवासियों के इतिहास, संस्कृति, परम्परा, जीवनदर्शन तथा आचार व्यवहार में एकरूपता दिखाई देती है। यों तो कोई भी राष्ट्र धरती का एक टुकड़ा ही होता है जिसमें नदी, पर्वत, नाले, झरने, वन, मैदान आदि के अतिरिक्त मनुष्यों द्वारा निर्मित बस्तियॉं भी होती हैं किन्तु उस भूभाग की सांस्कृतिक एकता ही वह मूलभूत तत्व है जो इस भूखण्ड को राष्ट्र की संज्ञा प्रदान करता है। इस प्रसंग में पृथ्वी सूक्त का निम्न मन्त्र मननीय है-
शिला भूमिरश्मा पांसुः सा भूमिः संधृता धृता।
अर्थात्‌ प्रत्यक्षतया तो यह धरती विभिन्न चट्‌टानों मिट्टी के कणों, प्रस्तर खण्डों तथा बालू रेत का ही समष्टि रूप है किन्तु जब यही भूखण्ड देशवासियों द्वारा सुसंस्कृत बनाकर सम्यक्‌तया धारण किया जाता है तो उसके साथ देश की गौरवमयी संस्कृति तथा इतिहास के गरिमामय प्रसंग जुड़ जाते हैं। तब प्रस्तरमयी शिलाओं तथा धूल के कणों वाली यह धरती हमारे लिए वन्दनीय तथा रक्षणीय राष्ट्र बन जाता है। इसी वैदिक तथ्य को अनुभव कर महर्षि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में सर्वत्र स्वदेश आर्यावर्त का कीर्तिगान किया है और इसके विगत ऐश्वर्य, वैभव तथा गौरव का उन्मुक्त कण्ठ से गान किया है। देशवासियों को स्वराष्ट्र के प्रति कर्त्तव्योन्मुख किया है। उनके अनुसार जिस देश के अन्न-जल से हमारा पालन हुआ है, क्या उसके प्रति हमारा कोई दायित्व और कर्त्तव्य नहीं है? स्वदेश में स्वराज्य की स्थापना का अपना पावन कर्त्तव्य बताते हुए उन्होंने लिखा था, ""चाहे कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। किन्तु विदेशियों का राज्य कितना ही मतामतान्तर के आग्रह से शून्य, न्याय-युक्त तथा माता-पिता के समान दया तथा कृपायुक्त ही क्यों न हो, कदापि श्रेयस्कर नहीं हो सकता।'' सत्यार्थप्रकाश, अष्टम समुल्लास।
इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि राष्ट्र की सुस्पष्ट धारणा से पुराकालीन आर्य लोग सर्वथा परिचित थे। इस प्रसंग में यह लिखना भी आवश्यक है कि हमारे विदेशी शासकों ने इस तथ्य को कभी स्वीकार नहीं किया कि भारत सुसंगठित तथा सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया एक राष्ट्र है। इस विचारधारा को देश के नागरिकों में प्रचारित करने के पीछे उनका एक गुप्त एजेण्डा था। उनके निहित गोपनीय स्वार्थ। वे नहीं चाहते थे कि भारत के निवासी अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को पहचानें तथा एकता के सूत्र में बन्धकर स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए सामूहिक उद्योग करें। अपने इस स्वार्थ की पूर्ति के लिए वे वहॉं के निवासियों को सदा यही पाठ पढ़ाते रहे कि भारत के आदिम निवासी तो कोल, भील, द्रविड़ जातियों के लोग थेजो कबीलों में रहते थे और उन्नतिशील आर्यों से उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं था। महर्षि दयानन्द ने पश्चिमी लोगों द्वारा प्रवर्तित इस मिथक को तोड़ा तथा इस बात को बलपूर्वक प्रतिपादित किया कि आर्य लोग ही आर्यावर्त के आदि निवासी थे। उनके बसने के पहले इस देश में अन्य किसी जाति का निवास नहीं था। उन्होंेने आर्यों और द्रविड़ों में धर्मगत भेद को नहीं माना। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लिखे गये इतिहासों से उत्पन्न भ्रान्तियों का प्रबल खण्डन किया और भारत के वास्तविक इतिहास के अनेक गौरवपूर्ण प्रसंगों को उजागर किया।
यदि हम आर्यों के विगत इतिहास को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस देश के विदेशी दासता के काल को छोड़कर अत्यन्त प्राचीन काल में देश की एकता को मजबूत करने का प्रयत्न यहॉं सदा होते रहे हैं। महाभारत काल को ही देखें। उस समय इस देश को विखण्डित करने के अनेक कारण उत्पन्न हो गये थे। अन्यायी, अत्याचारी, पराये स्वत्व को छीनने वाले क्षुद्रमनस्क शासकों के पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष के वशीभूत होकर हमारी प्रजा अत्यन्त पीड़ा तथा त्रास का अनुभव कर रही थी। उस समय कृष्ण जैसे महामनस्वी, नीतिज्ञ प्रज्ञापुरुष ने आर्य राष्ट्र के संरक्षण तथा नवनिर्माण की कल्पना को साकार किया। उन्होंने ही धर्मराज युधिष्ठिर को आर्यावर्त का एकछत्र सम्राट्‌ घोषित कराने का पुरुषार्थ किया तथा आसेतु हिमाचल भारत को एक अखण्ड राष्ट्र बनाया। महर्षि दयानन्द ने उस युगपुरुष को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए सर्वथा उपयुक्त ही लिखा था- ""देखो! महाभारत में कृष्ण का जीवन अत्युत्तम रीति से वर्णित हुआ है। उन्होंने जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त कोई अधर्म का काम नहीं किया था।''
इसी प्रकार समय-समय पर देश की आजादी तथा अखण्डता को सुरक्षित रखने के लिए महामति चाणक्य तथा समर्थ रामदास जैसे मनस्वी पुरुषों ने सम्राट्‌ चन्द्रगुप्त तथा हिन्दू पद पादशाही के आदर्श को क्रियान्वित करने वाले शिवाजी महाराज को प्रेरित किया। उधर महाराणा प्रताप, वीर दुर्गादास तथा दशम गुरु गोविन्दसिंह ने अत्याचारी केन्द्रीय शासकों से अपने राज्यों को स्वाधीन रखने के लिए सर्वोच्च वीरता तथा त्याग के अप्रतिम आदर्श रखे। ऋषि दयानन्द ने इन सभी इतिहास पुरुषों के राष्ट्रीय एकता में योगदान को आदर के साथ स्मरण किया है।
यों तो इस्लामी आक्रमणकारियों के समय से ही देश की एकता तथा अखण्डता को क्षति पहुंचने लगी थी, क्योंकि इन विदेशी हमलावरों की असहिष्णु नीति के कारण यहॉं के निवासी हिन्दुओं में असुरक्षा के भाव पैदा हो गये थे। जो हिन्दू अपने मत का त्याग कर इस्लाम को स्वीकार कर लेते, उन्हें सुरक्षा दी जाती थी, जबकि स्वधर्म पर स्थित रहने वालों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनने के लिए मजबूर किया जाता। उन्हें जजिया नाम का कर देना पड़ता तथा अपनी मर्जी के अनुसार पूजा उपासना के उनके मौलिक अधिकार भी छीने जाने लगे। इन्हीं तथ्यों को दृष्टिगत रखकर महर्षि दयानन्द ने मध्यकाल के असहिष्णु इस्लामी शासकों की कठोर साम्प्रदायिक नीतियों का विरोध किया। अपेक्षाकृत उन्होंने अंग्रेजी राज्य की इसलिए सराहना की है कि इस राज्य में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुकूल धर्मपालन करने की स्वतन्त्रता है तथा राजनैतिक पराधीनता होने पर भी देशवासी बहुत कुछ सुरक्षित जीवन बिता रहे हैं।
शताब्दियों के पश्चात्‌ राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता को साकार करने का एक अवसर हमें तब मिला जब यूरोपीय जातियों के सम्पर्क में आकर भारत में नवजागरण की स्फूर्तिमयी लहर उत्पन्न हुई। राजा राममोहन राय को नवजागरण का अग्रदूत कहा गया है। उन्होंने धर्म के क्षेत्र में वैदिक एकेश्वरवाद की पुनः स्थापना की। उन्होंने मध्यकालीन पौराणिक विश्वासों से उत्पन्न बहुदेववाद का प्रबल खण्डन किया तथा वेदों में निहित एकेश्वरवाद के सिद्धान्त को ही आर्यों का मूलभूत सिद्धान्त ठहराया। आलोचकों का तो कहना है कि राम मोहन राय द्वारा एकेश्वरवाद का प्रतिपादन एक मजबूरी थी, क्योंकि उन्हें ईसाइयत तथा इस्लाम में स्वीकृत एकेश्वरवाद की प्रतिद्वन्द्विता में हिन्दू एकेश्वरवाद को सिद्ध करना था। किन्तु यह आक्षेप सर्वथा मिथ्या तथा अन्यायपूर्ण है। ईसाइयत में तो पिता-पुत्र तथा पवित्रात्मा का त्रैत स्वीकार किया गया है, जबकि इस्लाम में अल्लाह की एकता पर जोर देने के साथ-साथ मोहम्मद के पैगम्बर होने की स्वीकृति आवश्यक समझी गई है। यथार्थतः राममोहन राय ने जिस एकेश्वरवाद का प्रतिपादन किया था वह वैदिक, औपनिषदिक तथा वेदान्त दर्शन पर आधारित एक सर्वोच्च सच्चिदानन्द सत्ता को स्वीकार करना ही था, किन्तु वह शंकर के एकेश्वरवाद तथा अद्वैतवाद से सर्वथा भिन्न था। ऋषि दयानन्द ने भी इसी प्रकार के एकेश्वरवाद को आर्य दर्शन के सर्वथा अनुकूल ठहराया तथा इसे देश की एकता के लिए अनिवार्य बताया।
राममोहन राय के प्रारम्भिक प्रयत्नों के पश्चात्‌ महर्षि दयानन्द ने ही देश की स्वतन्त्रता, एकता तथा अखण्डता के स्वर्णिम सूत्रों को प्रस्तुत किया। उन्होंने स्वधर्म, स्वसंस्कृति तथा स्वभाषा की एकता को राष्ट्रीय एकता के मजबूत स्तम्भ माना। उदयपुर प्रवास के समय पं. मोहनलाल विष्णुलाल पण्ड्‌या द्वारा पूछने पर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि जब तक देश के निवासियों में भाषागत, उपासनागत तथा विचारगत एकता नहीं होगी तब तक समग्र राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता स्वप्नवत अयथार्थ ही रहेगी। महर्षि दयानन्द के इस मन्तव्य का चिन्तन तथा तदनुकूल आचरण आज की प्रबल आवश्यकता है।

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