नैतिक उत्थान की विरासत
क्या भारत ने विवेकानंद की जन्म तिथि १२ जनवरी को युवा दिवस इसलिए घोषित किया है कि वह ३९ वर्ष में ही चल बसे थे? यदि विवेकानंद को गौतम बुद्ध की तरह, जीने वह बहुत मानते थे, अस्सी के ऊपर की आयु मिली होती तो क्या तब भी उनके जन्म दिवस को हम आज की तरह ही मनाते? उत्तर है, बिलकुल, क्यों नहीं? दरअसल, बात यह नहीं है की कौन कितने दिन जीवित रहता है, बल्कि यह है की वस् किस तरह जीवित रहता है और किस लिए जीवित रहता है . नरेंद्र, जो बाद में विवेकानंद कहलाये, की पूरी जिन्दगी, उनके सारे काम और उनकी सोच हमेशा से ऐसी रही मानो न तो उनमे कभी बचपना आया और न ही कभी बुढापा . जवानी जो एक बार आ गई, तो फिर कभी गई ही नहीं. वह चिर युवा रहे और इस लिए लगातार युवाओं को संबोधित करते रहे, बावजूद इसके कि उनके कुछ विचारों को समझने के लिए बड़े-बूढों को भी काफी मशक्कत करने पड जाती है . युवापन यानी ऊर्जा से लबालब जीवन की एक अवस्था . विवेकानंद ने जीवन को परिभाषित हुए अपने परम मित्र खेतड़ी राजस्थान के राजा अजित सिंह से कहा था, सतत प्रतिकूल स्थिति श्रृंखलाओं के विरुद्ध आत्मप्रकाश और आत्म विकास की कोशिशों का नाम ही जीवन है. विवेकानन्द का स्वयम् का जीवन संघर्षों के बीच विकसित होती जा रही परम चेतना की यात्रा की एक अद्भुत मिसाल है. चौबीस साल की उमर में संन्यास लेने के बावजूद वह अपने घर की समस्याओं से मुक्त नहीं हुए. वकील पिता के समय प्रति माह हज़ार रूपए खर्च करने वाले परिवार की मुखिया उनकी माँ भुवनेश्वरी को मात्र तीस रूपए के खर्च पर आ जाना पडा था . विवेकानन्द २३-११-१८९८ को खेतड़ी के महाराज को लिखे अपने पात्र में अपनी इस वेदना को इन शब्दों में व्यक्त किया, “मेरे सीने में एक पाप हर पल मुझे डंक मार मार कर यंत्रणा देता रहता है की मैंने अपनी माँ के प्रति बेहद अन्याय किया है.
यहाँ इस प्रसंग का इतने विस्तार से उल्लेख किये जाने का एक कारण है. उन्होंने एक बार काहा था जो माँ की पूजा नहीं करता वह कभी बड़ा और महान नहीं हो सकता. माँ के प्रति इसी गहरे अनुराग की भावना उन में बाद में श्रद्धा में तब्दील होकर श्री राम कृष्ण परमहंस के माध्यम से माँ काली से जुडी और इसी ने बाद में विस्तार पाकर भारत माता की सेवा में साकार रूप ग्रहण किया जिसे हम उनके सम्पूर्ण दर्शन के केंद्र के रूप में देख सकते हैं.
पिता वकील थे. उन से विवेकानंद ने जीवन के यथार्थ और तर्क को लिया. माँ भुवनेश्वरी कविता लिखती थीं. यहाँ से उनमे भावनात्मक तत्व की प्रबलता आई. इन दोनों ने मिलकर उनके कार्यों और विचारों को एक ऐसी प्रचंडता प्रदान की कि वह एक प्रकार से भारतीय चिंतन के उस पुनर्जागरण के पुरोधा बन गए, जिसकी जरूरत अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी के लिए जूझ रही भारतीय चेतना को अत्यधिक थी . खासकर युवाओं को. और यही कारण रहा कि १८९३ में शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में दिया गया उनका व्याख्यान भारतीय अस्मिता और आत्मविश्वास का प्रतिनिधि बन गया. उनके माध्यम से भारतीय मेधा का विश्व दृष्टिकोण पहली बार पूरी दुनिया के सामने इतने प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुआ था. विवेकानन्द केवल इन्हीं अर्थों में युवा नहीं थे कि शरीर में छतीसों बीमारियाँ होने के बाद भी वह अंत तक एक सक्रिय गतिशील रहे बल्कि इन अर्थों में भी थे कि उन्होंने धर्म और दर्शन में एक नया जोश भरा. संन्यास लेकर हिमालय की किसी गुफा में जाने की बजाय वह गरीब और उपेक्षित लोगों के बीच गए और उनके लिए काम किया. उन्होंने साफ़ तौर पर घोषणा की “मैं यह नहीं सीकार करता की जो इश्वर मुझे यहाँ रोटी नहीं दे सकता वह स्वर्ग में मुझे अनंत सुख दे सकेगा. यह कहने मं वह तनिक भी नहीं हिचके कि भूख से अधमरे व्यक्ति को धार्मिक सिद्धांतों की घुट्टी पिलाना उसके आत्म सम्मान पर आघात करना है. विवेकानन्द का मानना था कि गरीबों की समस्या को सुलझाए बिना, जनता को नैतिक और बौद्धिक रूप से सुदृढ़ बनाए बिना उन्हें स्वावलंबी बनाए बिना कोई भी धर्म कारगर नहीं हो सकता. इसीलिए उन्होंने रहस्यवाद जैसे पलायनवादी सिद्धांतो की जमकर खिल्ली उड़ाई.
वस्तुतः विवेकानन्द के धार्मिक दृष्टिकोण का केंद्र बिंदु मानुष ही था. वह युवा , जो चौबीस वर्ष की उम्र में इश्वर की खोज में निकला था अंततः मनुष्य को ही इस संसार का केंद्र बिंदु मानने पर विवश हुआ. उन्होंने लोगों का आह्वाहन किया कि वे मनुष्य में ही इश्वर को खोजें. उपनिषद का यह वाक्य कि “मैं वह हूँ तथा वह तू है” उनके प्रेरणा स्रोत थे. स्वयं को वेदांती कहने वाले विवेकानंद का वेदान्त अपने व्यापक अर्थों में मानवता को ही ब्रह्म अभिव्यक्ति के रूप में देखने का आह्वाहन करता है .
इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के पडोसी रहे इस विश्वमानव को मेट्रो पोलिटन इंस्टिट्यूट के सिद्धेश्वर लेन, चापातला के स्कूल में हेडमास्टरी से इस लिए हटा दिया गया था कि उन्हें पढ़ाना नहीं आता बात में यही व्यक्ति विश्व का शिक्षक बना. स्नातक की परीक्षा को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण न कर पाने वाले इस विद्यार्थी पर बाद में न जाने कितने विद्यार्थियों ने शोध कर के पीएचडी की डिग्रियां हासिल की और आगे भी करते रहेंगे. ऐसा क्यों होगा ? एक बार भगिनी निवेदिता से एक सवाल किया गया था कि राम्क्रिश और विवेकानन्द में क्या फर्क है . निवेदिता ने जवाब दिया अतीत में ५००० वर्षों में भारत ने जो कुछ सोचा चिंतन किया उसी के प्रतीक हैं श्री राम कृष्ण और आगामी १५०० वर्ष में भारत में जो कुछ सोचेगा, चिंतन करेगा उसी के अग्रिम प्रतिनिधि हैं स्वामी विवेकानंद.
स्वामी विवेकानंद के जीवन के प्रेरक प्रसंग – 1
स्वामी विवेकानंद के जीवन के प्रेरक प्रसंग – 1
लक्ष्य पर ध्यान लगाओ
स्वामी विवेकानंद अमेरिका में भ्रमण कर रहे थे . एक जगह से गुजरते हुए उन्होंने पुल पर खड़े कुछ लड़कों को नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगाते देखा . किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था . तब उन्होंने ने एक लड़के से बन्दूक ली और खुद निशाना लगाने लगे .
उन्होंने पहला निशाना लगाया और वो बिलकुल सही लगा ….. फिर एक के बाद एक उन्होंने कुल 12 निशाने लगाये और सभी बिलकुल सटीक लगे . ये देख लड़के दंग रह गए और उनसे पुछा , – भला आप ये कैसे कर लेते हैं ?
स्वामी जी बोले , – तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा दिमाग उसी एक काम में लगाओ. अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो तम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए. तब तुम कभी चूकोगे नहीं . अगर तुम अपना पाठ पढ़ रहे हो तो सिर्फ पाठ के बारे में सोचो . मेरे देश में बच्चों को यही करना सिखाया जाता है.
स्वामी विवेकानंद के जीवन के प्रेरक प्रसंग – 2
डर का सामना
एक बार बनारस में स्वामी जी दुर्गा जी के मंदिर से निकल रहे थे कि तभी वहां मौजूद बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया. वे उनके नज़दीक आने लगे और डराने लगे . स्वामी जी भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे, पर बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए और वे उन्हें दौडाने लगे.
पास खड़ा एक वृद्ध सन्यासी ये सब देख रहा था , उसने स्वामी जी को रोका और बोला , – रुको ! उनका सामना करो !
स्वामी जी तुरन्त पलटे और बंदरों के तरफ बढ़ने लगे , – ऐसा करते ही सभी बन्दर भाग गए.
इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बाद उन्होंने एक संबोधन में कहा भी – यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो, तो उससे भागो मत , पलटो और सामना करो.
स्वामी विवेकानंद के जीवन के प्रेरक प्रसंग – 3
सच बोलने की हिम्मत
स्वामी विवेकानंदा प्रारंभ से ही एक मेधावी छात्र थे और सभी उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित रहते थे. जब वो साथी छात्रों से कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुनते. एक दिन इंटरवल के दौरान वो कक्षा में कुछ मित्रों को कहानी सुना रहे थे , सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे की उन्हें पता ही नहीं चला की कब मास्टर जी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया.
मास्टर जी ने अभी पढ़ना शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी.
- कौन बात कर रहा है ? उन्होंने तेज आवाज़ में पूछा . सभी ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ इशारा कर दिया.
- कौन बात कर रहा है ? उन्होंने तेज आवाज़ में पूछा . सभी ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ इशारा कर दिया.
मास्टर जी क्रोधित हो गए, उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबधित एक प्रश्न पूछने लगे. जब कोई भी उत्तर न दे सका , तब अंत में मास्टर जी ने स्वामी जी से भी वही प्रश्न किया . पर स्वामी जी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते हों , उन्होंने आसानी से उत्तर दे दिया.
यह देख उन्हें यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बात-चीत में लगे हुए थे.
फिर क्या था उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी . सभी छात्र एक – एक कर बेच पर खड़े होने लगे, स्वामी जी ने भी यही किया.
तब मास्टर जी बोले, – ‘नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद ) तुम बैठ जाओ.’
‘नहीं सर , मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि वो मैं ही था जो इन छात्रों से बात कर रहा था.’ स्वामी जी ने आग्रह किया.
सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए.
स्वामी विवेकानंद के जीवन के रोचक प्रसंग – 1
गंगा हमारी माँ है और उसका नीर, जल नहीं, अमृत है.
एक बार स्वामी विवेकानन्द जी अमेरिका में एक सम्मलेन में भाग ले रहे थे. सम्मलेन के बाद कुछ पत्रकारों ने उन से भारत की नदियों के बारे में एक प्रश्न पूछा.
पत्रकार ने पूछा – स्वामी जी आप के देश में किस नदी का जल सबसे अच्छा है?
स्वामी जी का उत्तर था – यमुना का जल सभी नदियों के जल से अच्छा है.
पत्रकार ने फिर पूछा – स्वामी जी आप के देशवासी तो बोलते है कि गंगा का जल सब से अच्छा है.
पत्रकार ने पूछा – स्वामी जी आप के देश में किस नदी का जल सबसे अच्छा है?
स्वामी जी का उत्तर था – यमुना का जल सभी नदियों के जल से अच्छा है.
पत्रकार ने फिर पूछा – स्वामी जी आप के देशवासी तो बोलते है कि गंगा का जल सब से अच्छा है.
स्वामी जी का उत्तर था – कौन कहता है गंगा नदी है, गंगा हमारी माँ है और उस का नीर जल नहीं है, – अमृत है.
यह सुन कर वहाँ बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गये और सभी स्वामी जी के सामने निरुत्तर हो गये.
स्वामी विवेकानंद के जीवन के रोचक प्रसंग – 2
संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है
एक बार जब स्वामी विवेकानन्द जी विदेश गए… तो उनका भगवा वस्त्र और पगड़ी देख कर लोगों ने पूछा, - आपका बाकी सामान कहाँ है ?
स्वामी जी बोले…. ‘बस यही सामान है’….
स्वामी जी बोले…. ‘बस यही सामान है’….
तो कुछ लोगों ने ब्यंग्य किया कि… ‘अरे! यह कैसी संस्कृति है आपकी ? तन पर केवल एक भगवा चादर लपेट रखी है…….कोट – पतलून जैसा कुछ भी पहनावा नहीं है ?
इस पर स्वामी विवेकानंद जी मुस्कुराए और बोले, – ‘हमारी संस्कृति आपकी संस्कृति से भिन्न है…. आपकी संस्कृति का निर्माण आपके दर्जी करते हैं… जबकि हमारी संस्कृति का निर्माण हमारा चरित्र करता है
- संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है.
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