ताना नहीं मिलता तो बम नहीं फेंकते भगत सिंह
भारत के इतिहास में आठ अप्रैल एक महत्वपूर्ण तिथि है। 8 अप्रैल 1857 को जहां शहीद मंगल पांडेय को फांसी पर चढ़ाया गया था वहीं 8 अप्रैल 1929 को शहीद भगत सिंह ने लाहौर असेंबली पर बम फेंका था। इस तिथि पर वनइंडिया पेश कर रहा है दो-अलग अलग गाथायें। शहीद भगत सिंह के शहीदे आजम बनने की की कहानी भी कम रोचक नहीं है। शायद कम ही लोग जानते हैं कि यदि दोस्तों ने लड़की के साथ स बन्धों को लेकर ताना नहीं मारा होता तो लाहौर एसेंबली में आठ अप्रैल 1929 को बम फेंकने शहीद भगत सिंह नहीं जाते। वर्ष 1929 में अंग्रेजी सत्ता को भारत छोडऩे के लिये मजबूर करने के लिए लाहौर एसे बली में बम फेंकने की योजना बनायी गयी थी। इसकी कहानी भी अजब है। भगत ङ्क्षसह लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ते थे और उस समय एक सुंदर लड़की को उनसे प्रेम हो गया था। भगत सिंह के कारण वह भी क्रांतिकारी दल में शामिल हो गई थीं। मकसद सिर्फ एक था कि उसे भगत सिंह का साथ मिलता रहे। जब एसे बली में बम फेंकने की जि मेवारी देने की बात आई तो दल के नेता चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को यह जि मेदारी देने से मना कर दिया। आजाद यह मानते थे कि दल को भगत सिंह की बहुत ज...