ऋषि ऋण चुकाना है,आर्य राष्ट्र बनाना है


ऋषि ऋण चुकाना है,आर्य राष्ट्र बनाना है .
तो मिल के बढ़ो ,मंजिल पे चढो,चढ़ने का जमाना है,
देश के कोने-कोने में सन्देश सुनाना है ||
हम कस कर कमर चले हैं,निकले हैं, इस मार्ग में ले मजबूत इरादा |
......हम कभी न विचलित होंगे ,ना होंगे,परवाह नहीं आयें कितनी बाधा |
हमारा वेद खजाना है,जो सबसे पुराना है ,तो मिल के बढ़ो -----------|| १ ||
असमानता की ये खाई,हाँ खाई,अब पाटनी है समाज के आंगन में |
मजहब की ये दीवार...ें ,हाँ दीवारें,नहीं रखनी हैं माता के आँगन में |
पाखंड गढ़ ढाना है,दलितों को उठाना है,तो मिल के बढ़ो--------------|| २ ||
सूरज की किरण से तप कर,हाँ तप कर,जब निकलेगा मेहनत का पसीना |
सोना उगलेगी ये धरती, हाँ धरती, खुशहाली हो दूध -दही का पीना |
खेतों में कमाना है उद्योग लगाना है,तो मिल के बढ़ो------------------|| ३ ||
आपस के झगडे सारे, हाँ सारे , पंचायत में अपने आप निपटाओ | |
इस दहेज़ के चक्कर से,हाँ चक्कर से ,यह विनती करें समाज को बचाओ |
महंगे का जमाना है,ना लूटना -लुटाना है,तो मिल के बढ़ो------------|| ४ |


एक अनुपम श्रद्धांजलि :-



 १८८३ ई० का दीपावली का दिवस । अजमेर नगरी की भिनाय कोठी के एक कमरे के कक्ष में शय्या पर लेटा एक व्यक्ति जीवन की अन्तिम श्वासों से संघर्ष कर रहा है । यह व्यक्ति तूफानों से जूझते-जूझते स्वयं एक तूफान हो गया था । सहस्रों वर्षों की रूढियों और अन्ध विश्वासों से ग्रस्त मानवता को संजीवित करने के लिए उसने एक थपेड दी । जनता तिलमिला उठी । निद्रा में मूर्च्छित सा पडा जन समूह नींद से जगाने वाले के प्रति तीखी आंखों से देखने लगा । सब उसके विरोधी हो गये – देशी भी, विदेशी भी, अपने भी और पराये भी, आस्तिक भी और नास्तिक भी । सबने मिलकर षड्यंत्र रचा । वे पहचान न पाये, उस व्यक्ति को जो उसके लिए ही जूझा था । वह अकेला था । भगवान ही उसका भारोसा था । विष के घातक प्रभाव से त्रस्त शरीर इस योग्य नहीं रह गया था, कि वह अब इससे काम ले सके । "ईश्वर, तेरी इच्छा पूर्ण हो" – ऐसा कहकर उसने प्रभु का स्मरण किया । चेहरे पर हलकी सी सन्तोष की मुस्कराहट आयी, और वह चल बसा । जो कुछ कर सकता था, उसने किया । यह व्यक्ति था – दयानन्द । जो उस अकेले ने किया, क्या हम सब मिलकर भी उतना नहीं कर सकते !! विरोधी भी उसकी बातों को सुनते थे, उसकी बातों को अस्वीकार करने से भी डरते थे, क्योंकि दयानन्द सत्य के साथ, और सत्य दयानन्द के साथ था । दयानन्द जो कहता था, वह सिद्ध पक्ष था, जो विरोधी थे, उनका स्वार्थ पक्ष । "
– स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती



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