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Showing posts from 2018

रविन्द्र नाथ टैगोर का जीवन परिचय

रविन्द्र नाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक थे जिन्‍हें गुरूदेव कहकर भी पुकारा जाता था इन्‍हें साहित्‍य के लिए  नोबेल पुरस्‍कार  से भी नवाजा गया था ये एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) सम्मानित व्यक्ति हैं तो आइये जानते हैं रविन्द्र नाथ टैगोर का जीवन परिचय  इनका जन्‍म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ इनके पिता का नाम  देवेन्द्रनाथ ठाकुर और शारदा देवी था इन्‍होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा सेंट जेवियर स्कूल पूरी की थी टैगोर को बैरिस्टर बनाने की चाहत में इनके पिता जी ने इनका नाम 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक स्कूल में दर्ज कराया लेकिन बैरिस्‍टरी में इनकी रूचि न होने के कारण ये 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए इनका विवाह सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ था रबिन्‍द्रनाथ टैगोर ने अपनी पहली कविता महज आठ वर्ष की अवस्‍था में लिखी थी इन्‍होंने लगभग 2230 गीतों की रचना की थी टैगोर जी ने 1901 में पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में शांतिनिकेतन में एक...

कभी नहीं हारा था बहलोल

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डरपोक अकबर ने 7 फ़ीट 8 इंची बहलोल खान को भेजा था महाराणा प्रताप का सर लाने, कभी नहीं हारा था बहलोल मुगली अकबर का सबसे खतरनाक वाला एक सेना नायक हुआ. नाम - बहलोल खां . . . . कहा जाता है कि हाथी जैसा बदन था इसका . . . और ताक़त का जोर इतना कि नसें फटने को होती थीं . . . ज़ालिम इतना कि तीन दिन के बालक को भी गला रेत-रेत के मार देता था . . . . बशर्ते वो हिन्दू का हो . . . . . एक भी लड़ाई कभी हारा नहीं था अपने पूरे करियर में ये बहलोल खां ॥ काफी लम्बा था, 7 फुट 8 इंच की हाइट थी, कहा जाता है की घोडा उसने सामने छोटा लगता था ॥ बहुत चौड़ा और ताकतवर था बहलोल खां, अकबर को बहलोल खां पर खूब नाज था, लूटी हुई औरतों में से बहुत सी बहलोल खां को दे दी जाती थी ॥ फिर हल्दीघाटी का युद्ध हुआ, अकबर और महाराणा प्रताप की सेनाएं आमने सामने थी, अकबर महाराणा प्रताप से बहुत डरता था इसलिए वो खुद इस युद्ध से दूर रहा ॥ अब इसी बहलोल खां को अकबर ने भिड़ा दिया हिन्दू-वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप से . . . . . लड़ाई पूरे जोर पर और मुगलई गंद खा-खा के ताक़त का पहाड़ बने बहलोल खां का आमना-सामना हो गया अपने प्रताप से ...

रैदास की साखियाँ

हरि सा हीरा छाड़ि कै, करै आन की आस । ते नर जमपुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ।। १ ।। अंतरगति रार्चैँ नहीं, बाहर कथैं उदास । ते नर जम पुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ।। २ ।। रैदास कहें जाके ह्रदै, रहै रैन दिन राम । सो भगता भगवंत सम, क्रोध न ब्यापै काम ।। ३ जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास । प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रैदास ।। ४ रैदास तूँ कावँच फली, तुझे न छीपै कोइ । तैं निज नावँ न जानिया, भला कहाँ ते होइ ।। ५ ।। रैदास राति न सोइये, दिवस न करिये स्वाद । अह-निसि हरिजी सुमिरिये, छाड़ि सकल प्रतिवाद ।। ६ ।। - रैदास [रैदासजी की बाणी]

रैदास के दोहे

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात। रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।। रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं। तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।। हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा। दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।। कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै। तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।। कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा। वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।। -रैदास

रैदास के पद

अब कैसे छूटे राम रट लागी। प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥ प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥ प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥ प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥ प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै 'रैदासा'॥

रैदास | Ravidas

रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म सन् 1388 (इनका जन्म कुछ विद्वान 1398 में हुआ भी बताते हैं) को बनारस में हुआ था। रैदास कबीर के समकालीन हैं। रैदास की ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था। मध्ययुगीन साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है। कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के प्रमुख कवियों में विशिष्ट स्थान रखते हैं। कबीर ने 'संतन में रविदास' कहकर इन्हें मान्यता दी है। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का बिल्कुल भी विश्वास न था। वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं। सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी स़फाई से प्रकट किए हैं। इनका आत्मनिवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं। रैदास के चालीस पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ 'गुरुग्रंथ साहब' में भी सम्...

मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

जन्म प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे। जीवन धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था। शादी आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, "उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।......." उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लि...

हरि संग खेलति हैं सब फाग - सूरदास के पद

हरि संग खेलति हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।। सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन। बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।। डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग। अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।। एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि। छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।। मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई। भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नाईं।। छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि। सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।। दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद। सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद।।

मन न भए दस-बीस - सूरदास के पद

मन न भए दस-बीस ऊधौ मन न भए दस-बीस। एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस॥ इंद्री सिथिल भई केसव बिनु ज्यों देही बिनु सीस। आसा लागि रहत तन स्वासा जीवहिं कोटि बरीस॥ तुम तौ सखा स्याम सुंदर के सकल जोग के ईस। सूर हमारैं नंदनंदन बिनु और नहीं जगदीस॥ मन माने की बात ऊधौ मन माने की बात। दाख छुहारा छांडि अमृत फल विषकीरा विष खात॥ ज्यौं चकोर को देइ कपूर कोउ तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरि काठ मैं बंधत कमल के पात॥ ज्यौं पतंग हित जानि आपनौ दीपक सौं लपटात। सूरदास जाकौ मन जासौं सोई ताहि सुहात॥

सूर के पद | Sur Ke Pad

सूरदास के पदों का संकलन - इस पृष्ठ के अंतर्गत सूर के पदों का संकलन यहाँ उपलब्ध करवाया जा रहा है। यदि आपके पास सूरदास से संबंधित सामग्री हैं तो कृपया 'भारत-दर्शन' के साथ साझा करें। मुख दधि लेप किए सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥ चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए। लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥ कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए। धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥ प्रभू! जी मोरे औगुन चित न धरौ । सम दरसी है नाम तुम्हारौ , सोई पार करौ ॥  इक लोहा पूजा मैं राखत , इक घर बधिक परौ ॥ सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ ॥  इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ ॥ जब मिलिगे तब एक बरन ह्वै, गंगा नाम परौ ॥  तन माया जिव ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ॥ कै इनकौ निर्धार कीजिये, कै प्रन जात टरौ ॥ मैं नहिं माखन खायो मैया! मैं नहिं माखन खायो। ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥ देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो। हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥ मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं ...

सूरदास | Surdas

सूरदास जी वात्सल्य रस के सम्राट माने जाते हैं। उन्होंने श्रृंगार और शान्त रसों का भी बड़ा मर्मस्पर्शी वर्णन किया है। सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। "साहित्य लहरी' सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है - मुनि पुनि के रस लेख । दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख ।। इसका अर्थ संवत् १६०७ वि० माना जाता है, अतएवं "साहित्य लहरी' का रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाणित होता है कि सूर के गुरु श्री बल्लभाचार्य थे। इस आधार पर सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय की मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन मानी जाती है। उनकी मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य मान्य है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट और मृत्यु संवत् १६२० वि० के आसपास...

जलियाँवाला बाग में बसंत

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते, काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते। कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से, वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे। परिमल-हीन पराग दाग़ सा बना पड़ा है, हा! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है। ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना, यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना। वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना, दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना। कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें, भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें। लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले, तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले। किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना, स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना। कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर, कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर। आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं, अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं। कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना, कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना। तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर, शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर। यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना, यह है शोक...

खिलौनेवाला

वह देखो माँ आज खिलौनेवाला फिर से आया है। कई तरह के सुंदर-सुंदर नए खिलौने लाया है। हरा-हरा तोता पिंजड़े में गेंद एक पैसे वाली छोटी सी मोटर गाड़ी है सर-सर-सर चलने वाली। सीटी भी है कई तरह की कई तरह के सुंदर खेल चाभी भर देने से भक-भक करती चलने वाली रेल। गुड़िया भी है बहुत भली-सी पहने कानों में बाली छोटा-सा \\\'टी सेट\\\' है छोटे-छोटे हैं लोटा-थाली। छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं हैं छोटी-छोटी तलवार नए खिलौने ले लो भैया ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार। मुन्नूौ ने गुड़िया ले ली है मोहन ने मोटर गाड़ी मचल-मचल सरला कहती है माँ se लेने को साड़ी कभी खिलौनेवाला भी माँ क्याख साड़ी ले आता है। साड़ी तो वह कपड़े वाला कभी-कभी दे जाता है। अम्मा तुमने तो लाकर के मुझे दे दिए पैसे चार कौन खिलौने लेता हूँ मैं तुम भी मन में करो विचार। तुम सोचोगी मैं ले लूँगा तोता, बिल्लीा, मोटर, रेल पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा ये तो हैं बच्चों के खेल। मैं तो तलवार ख़रीदूँगा माँ या मैं लूँगा तीर-कमान जंगल में जा, किसी ताड़का को मारुँगा राम समान। तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों- को मैं मार भगाऊँगा यों ही कुछ दिन करते-करते रामचंद्र मैं बन जाऊँ...

कोयल (बाल-साहित्य )

देखो कोयल काली है, पर मीठी है इसकी बोली! इसने ही तो कूक-कूक कर आमों में मिसरी घोली॥ यही आम जो अभी लगे थे, खट्टे-खट्टे, हरे-हरे। कोयल कूकेगी तब होंगे, पीले और रस भरे-भरे॥ हमें देखकर टपक पड़ेंगे, हम खुश होकर खाएंगे। ऊपर कोयल गायेगी, हम नीचे उसे बुलाएंगे॥ कोयल! कोयल! सच बतलाओ, क्‍या संदेशा लाई हो? बहुत दिनों के बाद आज फिर, इस डाली पर आई हो॥ क्‍या गाती हो, किसे बुलाती, बतला दो कोयल रानी। प्‍यासी धरती देख, माँगती हो क्‍या मेघों से पानी? या फिर इस कड़ी धूप में हमको देख-देख दुःख पाती हो, इसीलिए छाया करने को तुम बादल बुलवाती हो॥ जो कुछ भी हो, तुम्हें देख कर हम कोयल, खुश हो जाते हैं। तुम आती हो - और न जाने हम क्या-क्या पा जाते हैं॥ नाच-नाच उठते हम नीचे, ऊपर तुम गाया करती। मीठे-मीठे आम रास भरे, नीचे टपकाया करती ॥ उन्हें उठाकर बड़े मजे से, खाते हैं हम मनमाना । आमों से भी मीठा है, पर कोयल रानी का गाना ॥ कोयल! यह मिठास क्‍या तुमने अपनी माँ से पाई है? माँ ने ही क्‍या तुमको मीठी बोली यह सिखलाई है॥ हम माँ के बच्चे हैं, अम्मा हमें बहुत है प्यारी हैं। उसी तरह क्या कोई अम्मा कोयल कहीं तुम्हारी है? डाल...

ठुकरा दो या प्यार करो | सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता

देव! तुम्हारे कई उपासक  कई ढंग से आते हैं । सेवा में बहुमूल्य भेंट वे  कई रंग की लाते हैं ॥ धूमधाम से साजबाज से  मंदिर में वे आते हैं । मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएँ  लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं ॥ मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी  जो कुछ साथ नहीं लायी । फिर भी साहस कर मंदिर में  पूजा करने चली आयी ॥ धूप दीप नैवेद्य नहीं है  झांकी का शृंगार नहीं । हाय! गले में पहनाने को  फूलों का भी हार नहीं ॥ मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ?   है स्वर में माधुर्य नहीं । मन का भाव प्रकट करने को  वाणी में चातुर्य नहीं ॥ नहीं दान है, नहीं दक्षिणा  ख़ाली हाथ चली आयी ॥ पूजा की विधि नहीं जानती फिर भी नाथ! चली आयी ॥ पूजा और पुजापा प्रभुवर ! इसी पुजारिन को समझो । दान दक्षिणा और निछावर  इसी भिखारिन को समझो ॥ मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी  हृदय दिखाने आयी हूँ । जो कुछ है, बस यही पास है इसे चढ़ाने आयी हूँ ॥ चरणों पर अर्पित है, इसको  चाहो तो स्वीकार करो । यह तो वस्तु तुम्हारी ही है,  ठुकरा दो या प्यार करो ॥ -  सुभद्रा कुमारी चौहान

मुरझाया फूल | कविता

यह मुरझाया हुआ फूल है, इसका हृदय दुखाना मत । स्वयं बिखरने वाली इसकी, पंखुड़ियाँ बिखराना मत ॥ जीवन की अन्तिम घड़ियों में, देखो, इसे रुलाना मत ॥ अगर हो सके तो ठण्डी - बूँदें टपका देना, प्यारे । जल न जाए संतप्त हृदय, शीतलता ला देना प्यारे ॥ -  सुभद्रा कुमारी चौहान

झाँसी की रानी

सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी, चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी॥ कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन 'छबीली' थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी, वीर शिवाजी की गाथाएँ उसकी याद ज़बानी थीं। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी॥ लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार, महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी । खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ॥ हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में, ब्याह हुआ ...