विनायक दामोदर सावरकर
देशभक्ति उस भावना को कहते हैं जहां इंसान अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठ देश के लिए जीने-मरने को तैयार रहे. लेकिन कई बार लोग देशभक्तों पर ही देशद्रोही होने का आरोप भी लगाते हैं. इस बारे में एक बड़े वर्ग का मत है कि सत्य और असत्य से परे अगर हम निष्पक्ष रूप से देखें तो पाएंगे कि एक शख्स जो देशभक्त हो वह कभी देशद्रोही नहीं हो सकता और अगर ऐसा होता है तो इसके पीछे बहुत बड़ी वजह भी होगी. वीर विनायक दामोदर सावरकर जी के संदर्भ में यह कथन सटीक बैठता है.
विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे. विनायक दामोदर सावरकर (Veer Vinayak Damodar Savarkar), 20वीं शताब्दी के सबसे बड़े हिन्दूवादी थे. दामोदर विनायक स्वदेशी और हिंदुत्व के भी कट्टर समर्थक थे. सावरकर को आज के समय के हिंदूवादी राजनीतिक दलों का आदर्श भी माना जाता है. विनायक सावरकर ही वह प्रथम शख्स थे जिन्होंने 1857 की लड़ाई कोसर्वप्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उपाधि दी थी.
वीर विनायक: एक क्रांतिकारी लेखक
वीर विनायक(Veer Savarkar) एक प्रखर लेखक भी थे. उन्होंने इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ “Indian Sociologist” , ‘तलवार’,’लंदन टाइम्स’(London Times) जैसी पत्रिकाओं में लेख लिखे. सावरकर भारत के पहले और दुनिया के एकमात्र लेखक थे जिनकी किताब को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटेन और ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य की सरकारों ने प्रतिबंधित कर दिया था.
1909 में वीर सावरकर ने 1857 की भारत क्रांति पर आधारित पुस्तक “1857 का संपूर्ण सत्य” (द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस) लिखी. जैसे ही अंग्रेजी हुकूमत को इसकी भनक मिली तो उन्होंने पुस्तक का प्रकाशन रुकवा दिया. हालांकि इसके बाद वीर सावरकर ने बिना हिम्मत हारे पुस्तक को हॉलैंड में मुद्रित करवाया. इस किताब में पहली बार 1857 की लड़ाई को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम युद्ध कहा गया था. इससे पूर्व जहां अंग्रेज इतिहासकार 1857 की लड़ाई को मात्र एक सिपाही विद्रोह मानते थे वहीं भारतीय विश्लेषकों की निगाहों में भी यह मात्र एक सिपाही आक्रमण ही था. लेकिन एक क्रांतिकारी विचारधारा से प्रभावित वीर सावरकर ने अपनी इस पुस्तक में युद्ध की बारीकियों को एक क्रांतिकारी की नजर से देखा और लिखा. इस पुस्तक को लिखने से पूर्व उन्होंने बहुत अध्ययन और शोध भी किए और एक ऐसी पुस्तक का निर्माण किया जिसका हर पन्ना एक गुलाम भारतीय के मन में क्रांति की नई मशाल जला पाने में सक्षम था.
इसके अलावा उन्होनें मेरा आजीवन कारावास नामक पुस्तक भी लिखी जिसमें उन्होंने अंडमान और कालापानी की कैद से जुड़े अपने अनुभवों को पाठकों के साथ शेयर किया. इस पुस्तक में उन्होंने वह सभी यातनाएं, भावनाएं, दर्द और वृतांत दिए जिसे उन्होंने कालापानी की कैद में सहा और अनुभव किया था. उनकी शैली हमेशा प्रखर और क्रांतिकारी रही. उनकी किताबों का हर शब्द देशप्रेम के रस में डूबा होता था. उनके विचार क्रांतिकारी थे और यही वजह है कि उनकी किताबों में भी आपको यही चीज देखने को मिलती है.
गांधी जी की हत्या करवाने का आरोप
इतने महान क्रांतिकारी का जीवन हमेशा संघर्षों के बीच रहा. 1948 ई. में महात्मा गांधी की हत्या में उनका हाथ होने का संदेह किया गया. इतनी मुश्किलों के बाद भी वे झुके नहीं और उनका देशप्रेम का जज़्बा बरकरार रहा और अदालत को उन्हें तमाम आरोपों से मुक्त कर बरी करना पड़ा. किसी क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी के लिए यह बहुत शर्मिदंगी की बात थी कि उसके ऊपर अपने ही देश के सेनानी को मारने का आरोप लगे. खैर सत्ता की चाह में तुच्छ लोगों के मंसूबे कभी कामयाब नहीं हुए और सावरकर जी की छवि आज भी स्वच्छ और एक बेहतरीन स्वतंत्रता सेनानी की है.
क्या देशद्रोही थे वीर विनायक दामोदर?
जिंदा रहते हुए तो वीर विनायक दामोदर को सरकार की अनदेखी और उपेक्षा का सामना करना ही पड़ा लेकिन मौत के बाद भी इस जालिम दुनिया ने उन पर सितम ढाना जारी रखा. संसद की लॉबी में महान क्रांतिकारी वीर सावरकर की फोटो लगाने पर काफी विरोध हुआ. कई लोगों ने उन्हें देशद्रोही तक कहा. ऐसा कहने वाले लोगों का तर्क था कि क्यूंकि वीर सावरकर ने अंग्रेजों से अपनी रिहाई के लिए क्षमा याचना की थी इस वजह से उन्हें देशद्रोही मानना ही तार्किक है.
हालांकि अधिकतर इतिहासकार इस तथ्य को झुठलाते हैं और उनकी राय में वीर सावरकर यह जानते थे कि अगर वह जेल में ही पड़े रहे तो देश की राजनैतिक स्थिति को उनके विचारों का सहयोग नहीं मिल पाएगा इसलिए उन्होंने एक योजनाबद्ध तरीके से अंग्रेजों से माफी मांग दुबारा उनके खिलाफ ही मोर्चा खोला था. इस तरह वीर सावरकर को देशद्रोही कहना सरासर गलत होगा. इस कूटनीति को देशद्रोह नहीं अपितु देश सेवा के लिए रणनीति कहना सही है.
सावरकर एक प्रख्यात समाज सुधारक थे. उनका दृढ़ विश्वास था कि सामाजिक एवं सार्वजनिक सुधार बराबरी का महत्त्व रखते हैं व एक-दूसरे के पूरक हैं. सावरकर जी की मृत्यु 26 फ़रवरी, 1966 को मुम्बई में हुई थी.
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